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सूफ़ी कवि बुल्लेशाह: रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई

काव्य डेस्क

Sahitya
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                            रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई
        
                                                    
                            
सद्दो मैनूं धीदो रांझा हीर ना आखो कोई।

[राँझा-राँझा करती हुई मैं खुद ही राँझा हो गई हूँ, मुझे राँझण धीदो पुकारो कोई हीर न कहो ।]

राँझा मैं विच मैं राँझे विच गैर ख़िआल ना कोई,
मैं नहीं उह आप है आपणी आप करे दिलजोई।

[राँझा मुझमें, मैं राँझे में, इसके अलावा और ख्याल नहीं आना चाहिए। मैं नहीं वो आए हैं, वह अपने आपसे कर रहा है दिलजोई ]

जो कुझ साडे अंदर वस्से जात असाडी होई,
जिस दे नाल मैं निहुँ लगाइआ ओहउ जैसी होई।

[हमारे अंदर जो बसता है वही हमारी जाति है, जिसके साथ मैंने नेहू लगाया है, मैं उस जैसी ही हो गई हूँ।]

चिट्टी चादर लाह सुट्ट कुड़ीए पहिण फ़कीरां लोई,
चिट्टी चादर दाग लगेसी लोई दाग़ न कोई।

[सफेद चादर उतार फेंक और फकीरों वाली चादर (लोई) पहन ले, ओढ़ ले। सफेद चादर में तो दाग लगेगा, लोई में कोई दाग नहीं लगेगा।]

तखत हजारे लै चल बुल्लिआ सिआलीं मिले ना ढोई,
रांझा रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई।

[बुल्ला कहते हैं तख्त हजारे (राँझा का गाँव) गाँव ले चल, यह सिआली (की हीर का गाँव) में कोई न मिलेगा]

हथ खूंडी मेरे अग्गे मंगू मोढे भूरा लोई,
बुल्ला हीर सलेटी वेखो किथे जा खलोई।

[हाथ में मेरे माँगने वाला कटोरा दे दो और कंधे पर भूरी लोई रख दो। बुल्ला कहते हैं कि सलेटी रंग की हीर कहाँ जाकर खड़ी हो गई है।]

भावार्थ: बुल्लेशाह इश्क में आशिक और माशूक एकम-एक होने का भाव दर्शाते हैं। यह वो अवस्था है जब ईश्वर के प्रेम में भक्त ईश्वर की लौ में लीन हो जाता है, दो ज्योति से एक जोत हो जाती है, यह हीर और राँझे के प्रेम की अवस्था है।

साभार - सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन  

एक वर्ष पहले
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