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सर्वेश्वर की कविताओं की एक विशेष पहचान उनमें कभी व्यक्त, कभी निहित व्यंग्य का स्वर भी है

Ratnesh Kumar Mishra

Sahitya
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                                                  क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है
बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हो। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य भी रचते रहे।

15 सितंबर 1927 को बस्ती (उ.प्र) में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन शुरू किया लेकिन जिन रचनात्मक उचाईयों को उन्होंने छुआ, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। उनका मानना था कि हमारे पास बच्चों के लिए साहित्य बहुत कम मात्रा में है, इससे बच्चों का भविष्य अधर में होगा। उन्होंने बच्चों के लिए कई कवितायें लिखीं - 

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता

उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में 


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कविता की तुकबंदियों से बहुत हद तक अपने को आज़ाद रखते हैं बावजूद इसके कविता के लय में कोई अंतर नहीं आया। 

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना    
और उस संगीत को सुनना

जो धमनियों में बजता है,...
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

 
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नई कविता के समर्थ कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जो एक ओर अपनी निजी कोमल भावनाओं को अपनी कविताओं में व्यक्त करते हैं वहीं दूसरी और आम जन की पीड़ा, आर्थिक विषमता से छटपटाते उनके दु:ख दर्द और अपने समय के यथार्थ को भी अभिव्यक्ति प्रदान करते, उनकी कविताओं में व्यवस्था के प्रति विरोध है, वंचित तबकों के लिए जगह है,सर्वेश्वर दयाल सदैव एक परिवर्तन-कामी कवि रहे हैं। इसके लिए, ज़ाहिर है, वे आत्मविश्वास को आवश्यक गुण मानते हैं। लीक पर चलना उन्हें पसंद नहीं है, वे कहते हैं –

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं 


बदहाली के लिए जिम्मेदार लोगों को वे दोषी मानते हैं और अपनी कविता भेड़िये में कहते हैं- 

भेड़िया गुर्राता है
तुम मशाल जलाओ
उसमें और तुममे

यही बुनियादी फर्क है
भेड़िया मशाल नहीं जला सकता

करोड़ों हाथों में मशाल लेकर
एक झाड़ी की ओर बढ़ो

सब भेड़िए भागेंगे

कितनी ही विषम परिस्थिति क्यों न हो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कभी उम्मीद नहीं छोड़ते। बस हमें “अभी और यही” कुछ न कुछ कर गुज़रना है

इंतज़ार शत्रु है
उसपर यकीन मत करो
उससे बचो
जो पाना फ़ौरन पा लो
जो करना है फ़ौरन करो.
अन्यथा ये गलीज़ “गुबरैले” हमें चैन से जीने नहीं देंगे


सर्वेश्वर की कविताओं की एक विशेष पहचान उनमें कभी व्यक्त, कभी निहित व्यंग्य का स्वर है। किसी भी कीमत पर अत्याचार और शोषण करने वालों को वे भेड़िया और गुबरैला तो कहते ही हैं, पर अपनी एक कविता “व्यंग्य मत बोलो” में यथा स्थितिवादियों पर भी जम कर कटाक्ष करते हैं. –

व्यंग्य मत बोलो .

काटता है जूता तो क्या हुआ
पैर में न सही
सर पर रख डोलो
व्यंग्य मत बोलो

अंधों का साथ हो जाए तो
खुद भी आँखें बंद कर लो
जैसे सब टटोलते हैं
 राह तुम भी टटोलो
व्यंग्य मत बोलो .

क्या रखा है कुरेदने में
हर एक का चक्रव्यूह भेदने में 
सत्य के लिए
निरस्त्र टूटा पहिया ले

लड़ने से बेहतर है
जैसी है दुनिया
उसके साथ हो लो
व्यंग्य मत बोलो 

कुछ तो सीखो गिरिगिट से
जैसी शाख वैसा रंग
जीने का यही है सही ढंग
अपना रंग दूसरों से
अलग पड़ता है तो
उसे रगड़ धो लो
 व्यंग्य मत बोलो

बाहर रहो चिकने
यह मत भूलो
यह बाज़ार है
सभी आए हैं बिकने
राम राम कहो और
माखन मिश्री घोलो
व्यंग्य मत बोलो


उनकी अनुभूतियाँ, तड़प, तकलीफें मिलकर कविता में बदल जाती हैं। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियों में भी नौकरी की, 1964 में जब 'दिनमान' पत्रिका शुरू हुई तो सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' के कहने पर सर्वेश्वरजी दिल्ली आ गए और 'दिनमान' से जुड़ गए। पत्रकारिता में आए तब भी मुखर होकर लिखते रहे और पत्रकारिता में उभरी हुई चुनौतियों को समझते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

उन्होंने नाटक भी लिखे, व्यंग्य विधा में शासकीय शोषण पर तंज करते हुए नाटक 'बकरी' लिखा -
 
बकरी को क्या पता था मशक बन के रहेगी,
अपने खिलाये फ़ूलों से भी कुछ न कहेगी,
उस के ही खूं के रंग से इतराएगा गुलाब,
दे उस की मौत जाएगी हर दिल अज़ीज़ ख़्वाब।


'तीसरा सप्तक', 'काठ की घंटियां', 'बांस का पुल', 'एक सूनी नाव', 'गर्म हवाएं', 'कुआनो नदी', 'जंगल का दर्द', 'खूंटियों पर टंगे लोग', 'क्या कह कर पुकारूं–प्रेम कविताएं' उनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं। उन्होंने कई नाटक और उपन्यास भी लिखे। 'पागल कुत्तों का मसीहा', 'सोया हुआ जल', 'उड़े हुए रंग', 'कच्ची सड़क', 'अँधेरे पर अँधेरा' उनके उपन्यास हैं। 'बतूता का जूता', 'महंगू की टाई' बाल कवितायें हैं।

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