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जन-वेदना से पैदा हुई हैं ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं

कुमार मंगलम

Sahitya
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                                                  ज्ञानेन्द्रपति हिंदी कविता का एक मुकम्मल व्यक्तित्व हैं। “आँख हाथ बनते हुए” (1970) संग्रह से लेकर अबतक “कविता भविता” (2020) तक उनके काव्य-यात्रा का एक विशद प्रमाण पाठकों के बीच है। “शब्द लिखने के लिए ही यह काग़ज़ बना है” (1981), “गंगातट”(2000), “संशयात्मा” (2004)’ “भिनसार” (2006), “कवि ने कहा” (2007), “मनु को बनाती मनई (2013)” और “गंगा बीती” (2019) इस यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। सत्तर के दशक में आँख हाथ बनते हुए से ही उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि मामला अब सिर्फ़ आँख का नहीं हैं, वे दृश्य से सृजन का यात्रा तय कर चुका है। 

ज्ञानेन्द्रपति अपने पहले संग्रह से ही यह तय कर लेते हैं, यह उनकी आरम्भिक प्रतिबद्धता है कि उनके सृजन में दृश्य को कविता की शर्त पर रचनात्मक होना है। उनके भीतर का प्रेक्षक बेहद सावधान और सतर्क है, जो दृश्य को लगातार कविता में रूपांतरित कर रहा है। यही वजह है कि वे एक ओर खजुराहो की मूर्तियों में भी कर्म कुशल हाथों की चिंता में संलग्न हैं तो वहीं बनता पुल भी उनकी चिंता का विषय है। एक ओर खजूही कुतिया है तो दूसरी ओर सड़क किनारे बैठने वाले मोची रामाराम भी हैं। ज्ञानेन्द्रपति का प्रेक्षक दृश्य के भीतर उतरने वाला है। वे किसी भी दृश्य को फ़ोटोग्राफ़िक नज़रिए से नहीं देख रहे हैं बल्कि उस दृश्य के भीतर वे गहरे रचे-बसे हैं। 
 
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ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं की दृश्यावली कतई मनोरम नहीं हैं, वे उस वेदना के सहभागी हैं जो “जन-मन-वेदना” से पैदा हुआ है। ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं की विलक्षणता सच्चिदानंद और ‘जन-मन-वेदना’ से आगे “जन-मन-करुणा” के रूप में तब्दील होकर पाठकों के बीच आती हैं। करुणा के धरातल पर भी कवि की मुट्ठी तनी हुई है। वे अपने भीतर तीव्र परिवर्तनकामी चेतना को एक क्रांतिकारी रोमान में समेटे हए हैं इस कारण उनकी मुट्ठी तनी हुई और रीढ़ सीढ़ी है। समकालीन इतिहास में हाशिए पर छूट गयी संवेदना वर्ग-शत्रुओं के ख़िलाफ़ युयुत्सु जयघोष में तब्दील हो जाता है, सामाजिक एवं आत्मिक आलोचना के नैतिक विवेक के ज़मीन पर। यहाँ एक ओर आत्मिक मुलाक़ातें हैं तो दूसरी ओर परित्यक्त और उपेक्षित का सौंदर्य भी मौजूद है, जिसमें नए अर्थ आँखुआते हैं। ये कविताएँ जीवनधर्मी हैं और मानवता को संपुष्ट करती हैं, जिनमें जीवन की तमाम रहस्यों के बीच रौशनी की तलाश है।

 “क्या है इन जुगनुओं का
 रहस्य? नहीं जानता
 नहीं जानना चाहता
मुझे अच्छा लगता है कोई एक जिस्म
 रोशनी ढोता हो और
 अँधेरे में चिनगी बना
 घूमता हो।”
(आँख हाथ बनते हुए)

“शब्द लिखने के लिए ही यह कागज़ बना है” में ज्ञानेन्द्रपति की कविता का मुहावरा  विराट जीवन से जीवन-द्रव्य लेकर एक विशाल कैनवस की निर्मिति करता है। ‘ट्राम में एक याद’ जैसी कविता में चेतना पारिख और ‘बनानी बनर्जी’ में जहां बनानी बनर्जी से आत्मिक मुलाक़ातें हैं वहीं उनकी राजनीतिक पक्षधरता बहुत स्पष्ट और मुखर होकर हमारे सामने विस्तृत रूप में सामने आती है। इस संग्रह में सम्पूर्ण क्रांति जो बाद में सम्पूर्ण भ्रांति जैसे मुहावरे में बदल गया; उन कारणों का शिनाख़्त भी मौजूद है।  समकालीन कविता अपने आरम्भ से ही नागर-बोध की रही है, यह अनायास नहीं है कि इस संग्रह में नगर-चित्र बहुलांश में मौजूद है, लेकिन ये कविताएँ अपनी जनपदीयता को नहीं छोड़ती, जिन्हें हम नागर-बोध समझ रहे हैं वे कविताएँ अपनी जनपदीय चेतना से उसका प्रत्याख्यान रचती हैं।

 बीज-व्यथा, गजदंतधूमगज, पटना का गोलघर अथवा खेसारी के दाल की तरह निन्दित कविता को नगर-चित्र के साथ जनपदीय चेतना से युक्त नागर-बोध का प्रत्याख्यान रचने वाली कविताओं के रूप में देखा जा सकता है। इसके साथ ही ज्ञानेन्द्रपति के नगर में पर्यावरणीय चिंता के साथ-साथ नगर के अधिक मानवीय सरोकार को बचाए रखने की चिंता भी मौजूद है। एक छोटी कविता से इसे समझा जा सकता है- 

“नदी के किनारे नगर बसते हैं
 नगर के बसने के बाद
 नगर के किनारे से
 नदी बहती है।” (शब्द लिखने के लिए...)

इस संकलन में पटना और कलकत्ता का नगर-चित्र बहुतायत में है, लेकिन इस नगर-चित्र में गाँव से एक आपसदरी का सम्बन्ध मौजूद है। यानी नगर की चिंताओं में ज्ञानेन्द्रपति गाँव से दूर नहीं होते बल्कि वे उस अविभाज्यता की तलाश करते हैं, जिसमें नगर का अस्तित्व गाँव से जुड़ा हुआ है। भिनसार में एक कविता है- पटना का गोलघर, इस कविता में किसान के स्वप्न और आकांक्षा का जो मार्मिक चित्रण किया है, वैसा चित्रण आगे चलकर देवीप्रसाद मिश्र की कविता में दिखता है। देवीप्रसाद मिश्र की कविता है- “भूमिहीन किसान जब/ मक़बरे में घुसा तो/ अंदाजने लगा यह/ कितने रक़बे में है।” (प्रार्थना के शिल्प में नहीं) ज्ञानेन्द्रपति की कविता को अब देखें- 

“गांव से आया किसान
थपथपाता है इसका विशाल पेट
 डरते-डरते
 और हिसाब गुनता है कि इसमें
 आखिर कितना आता होगा अनाज
 इसको भरने में कितने गाँवों के फेफड़े हांफते होंगे
 कि बीच में ही घबरा कर
 दिखाता है अपने बच्चे को
 देखो, गंगा पार वहाँ उस कोने पर
 है अपना गाँव
 उस ओर जिधर
जा रहा है स्टीमर का धुआँ।”

(भिनसार) भिनसार शीर्षक संकलन में पटना में घटित हो रहे सम्पूर्ण क्रांति और उसके असफलताओं को लेकर लिखी गयी कविता भी उल्लेखनीय है। इन कविताओं को पढ़ते हुए ज्ञानेन्द्रपति की राजनीतिक प्रतिबद्धता को साफ-साफ समझा जा सकता है। ज्ञानेन्द्रपति अपनी कविताओं में कविता के लिए अछूत समझे जाने वाले विषयों को भी हमेशा से उठाते रहे हैं। उनकी कविताओं में अक्सर हाशिए पर रह गए लोग और जीव-जंतु रहे हैं।

आशीर्वाद कविता में ज्ञानेन्द्रपति ने एक ऐसे विषय को उठाया है जो बचपन को बिलकुल अमानवीय ढंग से ख़त्म कर देने पर आमादा है किंतु ज्ञानेन्द्रपति उस बचपन को बचाने की चिंता करते हैं और अपना भविष्य उस बचपन में देखते हैं। सभी जीव अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अमरत्व या प्रजनन चुनते हैं, मनुष्य ने अपने अस्तित्व के लिए प्रजनन को चुना है। ऐसे में बुजुर्ग का बच्चे में अपने अस्तित्व को देखना बेहद स्वाभाविक है, जिसे ज्ञानेन्द्रपति अपनी कविता में सम्भव बनाते हैं।

‘गंगातट’ और ‘गंगा-बीती’ ज्ञानेन्द्रपति की सर्वाधिक चर्चित कृति है। इन दोनों कृतियों में गंगा और बनारस केंद्र में हैं। एक तरह से गंगा बीती, गंगातट का विस्तार है। इन दोनों संग्रहों में ज्ञानेन्द्रपति का प्रेक्षक विस्तार पाता है। हिंदी क्षेत्र में राजनीति का प्रभुत्व इतना अधिक है कि सबकुछ राजनीति के वृत्त के आसपास ही सिमटने लगता है। यहाँ तक कि कविता और विचार पर भी राजनीति हावी है।

ऐसे में कवि ज्ञानेन्द्रपति पर्यावरण विमर्श को पर्यावरणीय चिंता के साथ कविता के केंद्र में लाते हैं। फिर गंगा या बनारस कोई इकाई नहीं एक प्रतिनिधि पाठ के रूप में तब्दील होकर हमारे बीच एक बड़े चिंता के तौर पर उपस्थित होते हैं। प्रकृति अपने सामान्य अर्थ में मानवेत्तर ही नहीं मनुष्य के साहचर्य के साथ इन कविताओं में मौजूद है। हालाँकि इन कविताओं में राजनीति का स्वर भी मुखरता और प्रतिबद्धता के साथ साथ चलता है। ज्ञानेन्द्रपति उपभोग के लक्ष्मण रेखा का शिनाख्त करते हैं और उसका एक गांधीवादी रूपक इन कविताओं में तलाशते हैं, जिनके गुणसूत्र हमारे औपनिषदिक मानस में पहले से मौजूद है।

संशयात्मा ज्ञानेन्द्रपति का सर्वाधिक सशक्त संग्रह है और अन्य संग्रहों की तुलना में विपुल भी है। इस संग्रह में कवि का गाँव पथरगामा और झारखंड है, तो पटना, कलकत्ता और बनारस की उस्थिति भी है। इन कविताओं में अधिक विस्फारित ढंग से कवि की रचनात्मकता को चीन्हा जा सकता है। इसके साम्प्रदायिकता से उपजा बेचैनी है तो एक सांद्र और संयत कवि मन भी है, जो बहुत उम्मीद और जीवन के साथ अपने समय को देखता है।
 
मनु को बनाती मनई ज्ञानेन्द्रपति की प्रेम कविताओं और यूँ कहें स्त्री विषयक कविताओं का संकलन है। इस संग्रह के केंद्र में स्त्री है। जो किसी मनुष्य को अधिक मनुष्य बनाने के केंद्र में है। ग़ालिब के शब्दों में ‘आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना’ की तरह ये कविताएँ आदमी को इंसान बनाने का उपक्रम रचती है। इसमें ऐ काकी, दाई माँ, विदा माँ जैसी कविता है तो जरत्कारू जैसी कविता भी है। जीवन में साहचर्य का रंग है तो एकाकी जीवन के वियोग के कई चित्र भी मौजूद है।

‘कविता भविता’ ज्ञानेन्द्रपति की एक विलक्षण किताब है। इस किताब में कविता की रचना प्रक्रिया को कविता के माध्यम में ही व्यक्त करते हैं। भारतीय काव्य चिंतन में काव्यशास्त्रियों से लेकर रीतिवादी आचार्यों तक ने और बाद में कवि-चिंतक-आलोचकों  ने रचनाप्रक्रिया को लगातार समझने की कोशिश की है। ऐसे में कविता भविता अपनी विलक्षणता से हिंदी कविता की एक विशेष कृति ठहरती है। सभ्यता-समीक्षा का जो कार्य मुक्तिबोध अपनी आलोचना से संभव करने की कोशिश कर रहे थे, यहाँ ज्ञानेन्द्रपति उसी कार्य को कविता भविता में सम्भव करते हैं। कविता की रचनाशीलता को कविता के शिल्प में ही कहना एक बड़ी चुनौती है जिसे वे इस संग्रह में संभव करते हैं। 

‘एकचक्रानगरी’ ज्ञानेन्द्रपति का काव्य-नाटक है। उत्तर आघुनिकता की सैद्धांतिकी को लेकर फ्रेडरिक जेम्सन जैसे लेखकों के विचार का उदाहरण (एक का अनेक में संश्लेष) ही लें, तो हम स्वयं महसूस कर सकते हैं कि पूँजीवाद की उनकी आलोचना की भाषा कितनी तर्क-प्रवण वाग्मिता से युक्त और अपनी परम्परा से कितनी उत्कट संवेदना के साथ जुड़ी है। ‘एकचक्रानगरी’ जैसी कृति यह काम आसान कर देती है, जो हिंदी में समकालीन आलोचना न कर सकी, वह कविता में मौजूद है। यह कृति थोरोली पोलिटिकल कृति है। जिसका एक राजनैतिक रूपक बनता हैं। कृति के तत्कालीन समय और आज के तत्कालीन समय के रूपक को बकासुर के चरित्र में और अधिक विस्फारित रूप में चीन्हा जा सकता है। बकासुर के गुफा वाले दृश्य में ‘साध्य-साधन की एकता’ के रूप में न सिर्फ गाँधीवादी शब्दावली मौजूद है, बल्कि शक्ति-संरचना द्वारा गाँधीवाद का बेजा और अपने पक्ष में उपयोग किए जाने का षडयंत्र को भी देख सकते हैं।

ज्ञानेन्द्रपति की रचनाओं में एक परस्परिकता के गुणसूत्र मौजूद हैं, जिससे उनमें एक औपन्यासिक वितान बनता है। उस खासकिस्म की न्यूक्लियस को तलाशते ही ज्ञानेन्द्रपति की रचना संवादधर्मी हो जाती है। उनसे पाठक का साझापन बनने लगता है। फिर तद्भव-तत्सम-देशज शब्दावली प्रचुर कविता, कविता के सौंदर्य के बढ़ाने के कारक होते हैं, उसमें बाधक नहीं। ज्ञानेन्द्रपति समय से संवाद करने वाले और तमाम केंद्रकों में हाशिए पर रह गए चीजों को दर्ज कर एक वैकल्पिक इतिहासकार-सामाजिक बन जाते हैं, जहां उनकी रचनाएं सभ्यता-समीक्षा का पाठ निरंतर तैयार करती हैं। 
4 वर्ष पहले
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