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जब "जिस रात के ख़्वाब आए... गाने के बाद रफ़ी, नौशाद के गले लिपटकर रोने लगे मोहम्मद रफ़ी

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                                                  गुज़रे जमाने के मशहूर संगीतकार नौशाद ने मरहूम मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज के बारे में कहा था- " मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ की रेंज को पहचाना नहीं गया था। उनकी आवाज़ कितनी नीचे जा सकती है और कितनी ऊपर जा सकती है, किसी ने ध्यान नहीं दिया था।"

आगे नौशाद बताते हैं- "मैंने उनकी आवाज़ का इस्तेमाल फ़िल्म बैजू बावरा  के गीत 'ओ दुनिया के रखवाले' में किया था। उसी फ़िल्म के भजन 'मन तरपत हरि दर्शन को आज' को राग मालकौंस पर बनाया था जो बहुत ही पवित्र और पाकीज़गी से बनाया गया था।"
 
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जिस रात के ख़्वाब आए वह रात आई

उस समय रफ़ी साहब जहां भी जाते, उनसे इस गीत की फ़रमाइश की जाती थी। नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गाना अली सरदार ज़ाफ़री द्वारा लिखित फिल्म 'हब्बा खातून ' के लिए था। 

गाने के बोल थे 'जिस रात के ख़्वाब आए वह रात आई'। इस गाने के बाद मोहम्मद रफ़ी, नौशाद के गले लिपटकर रोने लगे और कहा- " नौशाद साहब मुद्दत बाद एक अच्छा गीत गाया है। आज बहुत सुकून मिला है, अब जी चाहता है कि इस भरी- पड़ी दुनिया को छोड़कर चला जाऊं।"

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इस गाने का मेहनताना रफ़ी साहब ने नौशाद के लाख इसरार पर भी नहीं लिया और उसी के अगले दिन नौशाद साहब को ख़बर मिली कि उनका इंतकाल हो गया। नौशाद साहब बताते हैं रमज़ान में उनका इंतेकाल हुआ था और रमज़ान में भी अलविदा के दिन। बांद्रा की बड़ी मस्जिद में उनकी नमाज़े जनाज़ा हुई थी। पूरा ट्रैफिक जाम था, क्या हिंदू, क्या मुसलमान और क्या ईसाई, हर कौम सड़कों पर आ गई थी।

साभार : नौशाद, ज़र्रा जो आफ़ताब बना (पेंगुइन प्रकाशन, लेखक- चौधरी ज़िया इमाम)   
8 वर्ष पहले
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