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जब दिनकर ने कहा- भूमिका लिखकर कवि फंस जाता है

रत्नेश मिश्र

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                                                  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ छायावादोत्तर राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना और व्यक्तिगत सौंदर्य मूलक प्रेम- संवेदना दोनों के सक्षम कवि हैं। दिनकर में संवेदना और विचार का बहुत सुंदर समन्वय दिखाई पड़ता है। चाहे व्यक्तिगत सौंदर्य मूलक प्रेममूलक कविताएँ हो चाहे राष्ट्रीय कविताएँ हो, सभी कवि की संवेदना से स्पंदित हैं। दिनकर में आरंभ से ही अपने को अपने परिवेश से जोड़ने की तलब दिखाई पड़ती है इसलिए उनमें सर्वत्र एक खुलापन है, लोकोन्मुक्तता है, सहजता है, छायावादी या उत्तरछायावादी वैयक्तिक कविता की कुंठा , अतिरिक्त अवसाद तथा निराशा के घिराव के स्थान पर प्रसन्नता और सौंदर्य के प्रति स्वस्थ मानवीय प्रतिक्रिया दिखाई पड़ती है। दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के प्रति जागरूकता । कवि देश और काल के सत्य को अनुभूति और चिंतन दोनों स्तरों पर ग्रहण करने में समर्थ हुआ है। दिनकर ने गीत भी लिखे हैं और प्रबंध काव्य भी। वे एक ऐसे कवि हैं जो मंचो पर भी सम्मानित होते थे और यों तो बड़े कवि थे ही।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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दिनकर जी मंच से प्राय:‘मेरे हिमगिरि मेरे विशाल’ कविता पढ़ते थे। काशी जाने से पहले भी मैंने कई बार उन्हें मंच पर पढ़ते हुए देखा था। काशी जाने के बाद एक बार उनके साथ भी मुझे कविता पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। सन् याद नहीं। छठे दशक के बीच का कोई साल रहा होगा। नागरी प्रचारिणी सभा में आकाशवाणी की ओर से एक कवि-सम्मेलन आयोजित हुआ था। उसमें दिनकर जी के साथ मुझे तथा कुछ और नये लोगों को कविता पढ़ने का सुख प्राप्त हुआ था।

मेरा ख्याल है कि सन् पचास के आस-पास का कोई साल रहा होगा। जब दिनकर ने नागरी-प्रचारिणी सभा के कक्ष में ‘कुरुक्षेत्र’ का पूरा पाठ किया था। केशवप्रसाद मिश्र और अन्य कई विद्वान श्रोता के रूप में बैठे हुए थे। अंत में केशव जी ने पुस्तक के संबंध में अपनी राय व्यक्त की। मुझे याद नही है कि वह प्रीतिकर थी या अप्रीतिकर। जैसा कि मेरा स्वाभाव है मैंने अपनी ओर से दिनकर को आत्मीयता पाने की कोशिश नहीं की।

जब मैं बीएचयू में था तब बिड़ला छात्रावास में रहता था। मेरे बगल के कमरे में शिवसागर मिश्र रहते थे। वे दिनकर जी के जामाता थे। वे रोज सुबह उठकर हाथ-मुंह धोकर गाते थे- ‘सेजिया से सइया रूठ गइले/ कोयल तोय मीठी बोलिया’। उनके आवाज़ से मेरी भी सुबह संगीतमय हो उठती थी। शिवसागर जी के माध्यम से दिनकर जी बार-बार याद आते थे। सन् 56 में मैं गुजरात चला गया। तब तो हिंदी जगत के लोगों से मिलने जुलने का सवाल ही नहीं रहा।

मेरा ख्याल है सन् 1961 का साल रहा होगा। दिनकर जी अहमदाबाद आए हुए थे। उस समय वे राज्यसभा के सदस्य भी थे। मैं सेंट जेवियर कॉलेज में प्रवक्ता था और एम.ए. केंद्र का प्रभारी भी था। मैंने दिनकर जी को अपने कॉलेज में आमंत्रित किया। उन्होंने आना स्वीकार कर लिया। मैं एम.ए. की कक्षा ले रहा था जिसके बाद दिनकर जी का आगमन था। इसलिए विद्यार्थी बहुत उत्सुक होकर मुझसे कह रहे थे कि सर ! दिनकर जी आने वाले हैं। क्लास खत्म कर दीजिए। खैर दिनकर जी आए । वे प्रभावशाली वक्ता तो थे ही, जमकर अपनी बात कही। ‘उर्वशी’ का प्रकाशन हो चुका था। वह खूब चर्चा में थी। भगवतशरण उपाध्याय ने ‘कल्पना’ में उसके विरूद्ध लेख लिखा था। 

इसलिए प्रीतिकर और अप्रीतिकर आलोचना का दौर गतिमान हो गया था। ‘उर्वशी’ की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठाए गए थे। यहाँ भी कुछ छात्रों ने भूमिका के बारे में प्रश्न किए। दिनकर जी ने हँसकर कहा- भूमिका लिखना अपराध हो गया। वास्तव में भूमिका लिखकर कवि फँस जाता है। अध्यक्षता सेंट जेवियर कॉलेज के प्राचार्य फादर डिसूजा कर रहे थे। वे भी अद्भुत वक्ता थे। हिंदी नहीं जानते थे। उन्होंने मुझसे कान में धीरे से पूछा- ‘दिनकर’ का मतलब क्या होता है? मैंने कहा ‘सन’। 

बस इतना कहना था, फिर तो प्राचार्य डिसूजा ने दिनकर के बारे में खूब अच्छा वक्तव्य दिया। एक या दो दिन बाद अहमदाबाद के ही किसी और कॉलेज में दिनकर जी के सम्मान में एक समारोह आयोजित हुआ। हाँ ! याद आया उस कॉलेज के प्राचार्य कांग्रेस के चिम्मन भाई पटेल थे । कॉलेज के खुले मैदान में समारोह आयोजित हुआ। मंच पर दिनकर जी बैठे थे। उन्हें कविता पाठ भी करना था और वक्तव्य भी देना था। कुछ देर बाद स्वर गूँजा कि रामदरशमिश्र को भी मंच पर बुलाया जाए। उनसे भी कविता पढ़वाई जाए। बहरहाल मैं मंच पर गया। दिनकर जी के पास बैठा और अपनी ‘निशान’ कविता पढ़ी जो लोगों को बहुत प्रिय थी। कविता यों थी-
 
हाँ, यह मकान होकर तिमंजिला चौमंजिला हो गया
इसकी सीमेंट सूखकर कड़ी हो गई
लेकिन उस दिन तुमने मजाक-मजाक में
गीली सीमेंट पर जो मुलायम पाँव रख दिया था
उसका निशान,
ज्यों का त्यों है 

दिनकर जी अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा- और सुनाइए। तो मैंने ‘मायानगर’ कविता सुनाई। फिर भी पता नहीं मैं दिनकर जी की याद में उतरा कि नहीं उतरा।

सन् 1964 में मैं दिल्ली आ गया। और यहाँ-वहाँ आयोजित गोष्ठियों में उनसे भेंट होने लगी और कुछ शिवसागर के माध्यम से और कुछ उसके साथ पढ़ी गई मेरी कविताओं के माध्यम से दिनकर जी से लगाव हो गया। जब भी किसी सभा में वे आते तो मुझे देखते ही कहते- रामदरश ! तुमने अच्छा किया कि गद्य में आ गए। मैं उनसे कहता कि मैं गद्य में भी आ गया। वे दूसरी बात कहते रामदरश तुम अपने बाल रंगकर काले क्यों नहीं कर लेते। मैं कहता -जैसे हैं वैसे ही अच्छे हैं।

दिनकर जी बहुत विनोद प्रिय भी थे। अनेक बार उन्हें लोगों को प्यार से छेड़ते हुए देखा था। दिनकर जी का राज्यसभा काल समाप्त हो गया था। अब बच्चन जी राज्यसभा में जा रहे थे। इस उपलक्ष्य में एक स्वागत समारोह आयोजित किया गया। लोगों ने बच्चन जी को बधाइयां दी और आशा व्यक्ति की कि बच्चन जी के माध्यम से राज्ससभा में हिंदी का सम्मान बढ़ेगा।

‘रसवंती’ और ‘उर्वशी’ दोनों में प्रेम और सौंदर्य का प्रभावशाली चित्रण है। दिनकर अपनी फुटकर कविताओं के कारण तो एक यशस्वी कवि बने ही लेकिन उन्हें अत्यधिक ऊँचाई प्राप्त हुई प्रबंध काव्यों से। ‘रश्मिरथी’, ‘उर्वशी’, ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबंध काव्य है। ‘रश्मिरथी’ का कथानक महाभारत से लिया गया है। किंतु उसमें केवल कर्ण के चरित्र को आधुनिक
मानववाद के विकास में उद्घाटित करने का सफल प्रयास है। ‘रश्मिरथी’ का कथ्य है कर्ण के माध्यम से कलंकित उपेक्षित मानवता की मूकता को वाणी देना। कर्ण स्वयं कहता है-
 
मैं उनका आदर्श कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे 
पूछेगा जग किंतु पिता का नाम न बोल सकेंगे।
जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा
मन में लिए उमग जिन्हें चिरकाल कलपना होगा।

कर्ण सूर्य पुत्र है यानी प्रकाश पुत्र। तमाम उपेक्षित, कलंकित किंतु, सामर्थ्यवान पुरुष सामान्य प्रजा में दिखते हैं। इतिहास और भाग्य जिनकी उपेक्षा करते चले जाते हैं। और जो पुरुषार्थ से उनसे लड़ना ही जीवन समझते हैं। अपनी अनेक मान्य विशेषताओं का जड़ रूप कर्ण नहीं है। वह अपने अखंड पौरुष, जीवन-विश्वास और उदात्तशील के बीच कहीं टूटा हुआ है, हारा हुआ है, प्यासा है। हर उपलब्धि उसकी झोली से सरक जाती है। उसमें कर्ण और कुंती का संवाद भी बहुत मार्मिक है।

'कुरुक्षेत्र' एक काव्यात्मक गीता है जिसमें आध्यात्मिक चिंतन के स्थान पर आधुनिक जीवन के प्रश्नों का चिंतन है। युद्ध की समस्या को लेकर लिखे गए प्रबंध काव्यों में कुरुक्षेत्र का बहुत ऊँचा स्थान है। कवि ने युद्ध को निम्न बताते हुए भी आधुनिक परिवेश में उसके जटिल रूप को उसके संक्रांत मूल्य को उभारा है।

‘उर्वशी’ भी दिनकर की प्रबंध कृति है। इस बहुचर्चित प्रबंध काव्य में कवि ने उर्वशी और पुरुरवा के प्राचीन आख्यान को एक नये अर्थ से जोड़ने चाहा है। पुरुरवा और उर्वशी अलग-अलग तरह की प्यास लेकर एक दूसरे के करीब आए। पुरुरवा धरती-पुत्र है और उर्वशी देवलोक से आई अप्सरा है। उर्वशी काव्य का दर्शन पक्ष है। प्रेम और ईश्वर, जैव और आत्म धरातल को परस्पर मिलाना। ‘उर्वशी’ काव्य की दृष्टि से भी बहुत उत्कृष्ट है। उसमें कवि ने पुरुरवा और उर्वशी के मनोजगत की गहरी पहचान की है। पुरुरवा की मानसिक अवस्था को कवि ने इन पंक्तियों में रूपायित किया है-

किंतु जगकर देखता हूँ
कामनाएं वर्तिकाएं सी बल रही हैं
जिस तरह पहले पिपासा से विकल थी
प्यास से व्याकुल अभी भी जल रही हैं
रात भर मानो उन्हें दीपक सदृश जलना पड़ा हो
नींद में मानो किसी मरुदेश में चलना पड़ा हो

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, यह संस्मरण उनकी फेसबुक वाल लिया गया है)
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