लाश तक घर को न लौटी ऐसा मक़तल भा गया!
मजाज़ जैसे मुकम्मल शायर पर एक अधूरा मज़मून!
मजाज़ मर गए!
मजाज़ ने खुदकुशी की!
या मजाज़ का कत्ल किया गया...
दरअसल यह तीन अलग अलग खबरें थीं और इन तीन ख़बरों को एक ही ख़बर की कब्र में दफन कर दिया गया।
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आधी सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी मजाज़ की मौत पर यकी़न से कुछ भी नहीं कहा जा सकता... कि यह खुदकुशी थी, क़त्ल था फिर एक कुदरती मौत थी। शायर मुनव्वर राणा ने अपनी किताब बगै़र नक़्शे का मकान में मजाज़ की मौत के सिलसिले पर कुछ बेहद असरदार पंक्तियां लिखी हैं ।
राणा के अनुसार हैरत है कि पानी की टंकी या बिजली के टॉवर पर चढ़कर खु़दकुशी का एलान करने वाले के साथ एक जमाना हो जाता है । लेकिन मजाज़ अगर खु़दकुशी ही करना चाहते थे तो उनको बचाने वाले कहां छुप गए थे ।
उनकी मदद के लिए संजीदगी से आगे कोई क्यों नहीं आया । हालांकि वह इतनी बेहिसी का दौर भी नहीं था। उस वक्त अदब की लंका में बावन गाजि़यों की एक पूरी फौज़ थी और सत्ता धारियों में भी मजाज़ और उर्दू से मोहब्बत करने वालों की भीड़ कम नहीं थी।
राणा आगे फरमाते हैं कि लोगों के मद्दे मुका़बिल आ गए, जो कभी उनके आइडियल हुआ करते थे । मजाज़ की बेइंतिहा जि़हानत, पुरलुफ्त गुफ़्तगू और हाजिर जवाबी सुनने वालों से ज्यादा उनके मुआसिरीन यानी जमाने के लाेगों की तफरीह का सामान बन गई। बल्कि अगर इस बात को सलीके से कहने की इजाज़त दी जाए तो यूं कहा जा सकता है कि मजाज़ भी इंशा की तरह अपनी बेइंतहा जि़हानत का शिकार हो गए।
मुनव्वर के अनुसार इंशा को़ बादशाह ने उनके घर में कैदकर मार दिया था और मजाज़ को उनके मुआसिरीन ने इतनी ढील दे दी थी कि वो अपने आपको क़त्ल करने में कामयाब हो गए
'ऐसा लगता है कि कर देगा आजा़द मुझे
मेरी मर्जी से उड़ाने लगा सय्याद मुझको'