मेरा जन्म शेखुपुरा जिले (अब पाकिस्तान) के फुल्लारावां गांव में हुआ था।
मैंने खालसा कॉलेज, अमृतसर से अंग्रेजी में एमए किया। साहित्य के प्रति
मेरी रुचि तो युवावस्था में ही हो गई थी, लेकिन मैं ज्यादातर छोटी कहानियों का मुरीद था।
एक लेखक के तौर पर मैंने अगर छोटी कहानियां लिखने की ओर ज्यादा ध्यान दिया,
तो इसकी वजह यही है। एक और बात यह है कि पंजाबी साहित्य में छोटी कहानियां
लिखने का चलन कुछ अधिक है। विभाजन ने सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर ही मुझे
दुखी नहीं किया, बल्कि इसने हमें विभाजन से जुड़े दर्द और बिछोह की
कहानियां लिखने में भी मदद की। यह केवल मेरा सच नहीं है, बल्कि मेरी पीढ़ी
के अनेक लेखकों से जुड़ी सच्चाई है। इसके बावजूद मैं अपने लेखन में आशावादी
हूं। मेरे जीवन का बड़ा हिस्सा शहरों में गुजरा, लेकिन मेरी कहानियों में
शहरी चरित्रों के अलावा पंजाब के गांव और ग्रामीण भी खूब आते है। मेरा
मार्क्सवादी वैचारिकता में यकीन तो रहा ही, जिसके सुबूत मेरी कहानियों में
मिलते हैं, पात्रों के मनोवैज्ञानिक चित्रण में भी मैंने खासी दिलचस्पी
दिखाई। इसकी एक वजह शायद यह है कि मैंने युवावस्था में चार्ल्स डिकेंस और
चेखव की कहानियां बेहद मनोयोग से पढ़ी थीं।
मेरी कहानियां उतार-चढ़ाव, दर्द और विनाश की कहानियां हैं, लेकिन अपने जीवन
में मैंने औरतों की ताकत और सहनशीलता बहुत देखी है, जिसके उदाहरण मेरी कहानियों में मिलता है।
-विख्यात पंजाबी कथाकार