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फै़ज़ अहमद फै़ज़ अपनी रचनाओं का बहुत ख़राब पाठ करते थे

शरद मिश्र

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                                                  फै़ज़ अहमद फै़ज़ बहुत बड़े शायर और ग़ज़लकार थे लेकिन वह अपनी रचनाओं का बहुत ख़राब पाठ करते थे । प्रसिद्ध लेखक रवींद्र कालिया ने अपनी किताब गा़लिब छुटी शराब में इसका उल्लेख किया है। कालिया लिखते हैं कि 1981 के अप्रैल महीने के आखिरी हफ्ते की एक ऐतिहासिक शाम विभूति के घर फै़ज़ के नाम दर्ज हो गई ।     
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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कोई खोया हुआ सिद्धार्थ अपने घर लौट आया...

हिंदी उर्दू के लेखकों शायरों और रंगकर्मियों को उस शाम फै़ज़ के सान्निध्य का मतलब समझ में आ गया। एेसा लग रहा था कई युगों और समुद्रों से पार अपनी बिरादरी से कोई खोया हुआ सिद्धार्थ अपने घर लौट आया । 

धीरे धीरे वह शाम फरमाईशी कार्यक्रम में बदल गई थी...

फै़ज़ गज़ल सुना रहे थे और श्रोताआें में उपेंद्रनाथ अश्क, डॉ मुहम्मद अकील रिजवी, अमरकांत, दूधनाथ सिंह सहित अन्य साहित्य प्रेमी हाजिर थे।धीरे धीरे वह शाम फरमाईशी कार्यक्रम में बदल गई थी, सभी अपनी पसंदीदा ग़ज़लेेें फै़ज़ की आवाज में सुनना चाहते थे और रिकाॅर्ड करना चाहते थे।

फै़ज़ हर किसी की फरमाइश पूरी कर रहे थे...

कालिया आगे लिखते हैं कि फै़ज़ हर किसी की फरमाइश पूरी कर रहे थे । यहां इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी लग रहा है कि फै़ज़ अपनी रचनाआें का बहुत खराब पाठ करते थे, जैसे अपने किसी दुश्मन का कलाम सुना रहे हों ।

लग रहा था वह शायरी नहीं कोई नीरस गद्य सुना रहे हैं...     

बकौल कालिया उनकी ग़ज़लों का उनसे बेहतर पाठ करने वाले उसी महफिल में मौजूद थे। मैंने किसी शायर को इतनी बेदिली से अपनी रचनाओं का पाठ करते नहीं देखा या सुना। लग रहा था वह शायरी नहीं कोई नीरस गद्य सुना रहे हैं।
3 वर्ष पहले
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