विज्ञापन

राजेंद्र धोड़पकर : एक डॉक्टर जो बतौर कार्टूनिस्ट मशहूर हुए, कविता के लिए भी मिला प्रतिष्ठित सम्मान

अमर शर्मा

Mud Mud Ke Dekhta Hu
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  बीसियों पन्नों के अख़बार में एक ज़रा सा कार्टून जितना हमें समाज के बारे में समझा देता है, उतना हज़ारों शब्दों वाला कोई लेख भी हमें नहीं समझा पाता। अगर आप समाचार पत्र पढ़ते हैं तो राजेंद्र धोड़पकर के कार्टून आपने ज़रूर देखे होंगे। राजेंद्र धोड़पकर हमारे समय के बड़े कार्टूनिस्ट हैं। उनके कार्टून में हमें समय और राजनीति की सबसे सटीक अनुगूंजें देखने को मिलती हैं।

राजेंद्र जी बतौर कार्टूनिस्ट बहुत मशहूर हुए। लेकिन उनकी शख़्सियत का एक दूसरा पहलू भी है जो बहुत काव्यात्मक है। कविता के लिए उन्हें प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल सम्मान मिला। राजेंद्र धोड़पकर के काव्य संग्रह 'दो बारिशों के बीच' में उनकी कविता 'तुम्हारा नाम' - 

तुम्हारे नाम का एक-एक अक्षर आता है मुझ तक
एक-एक लहर पर सवार
यह विस्मृति का समुद्र है

लगातार बारिश के दिनों में जब
लगातार एक धूसर अँधेरे में
मृतकों और जीवितों के बीच फर्क मिटने लगता है
बहुत पहले झरे हुए फूल
फिर से पौधों पर खिलने लगते हैं

मैं अपने को पाता हूं एक लगातार बरसते
धुंधले समुद्र तट पर
स्मृति-विस्मृति की सीमा पर

वहां सिर्फ तुम्हारा नाम मुझ तक
लौट-लौट कर आता है। 
विज्ञापन

राजेंद्र धोड़पकर का जन्म 11 अगस्त 1956 में इंदौर में हुआ। भोपाल से एम.बी.बी.एस करने के बाद कुछ सालों तक डॉक्टरी और दूसरे कामकाज भी किए। लेकिन डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वे कार्टून की दुनिया में कैसे आए?

इस सवाल के जवाब में राजेंद्र धोड़पकर ने एक इंटरव्यू में कहते हैं, "हर व्यक्ति में कई तरह की योग्यताएं होती हैं। और हर व्यक्ति अपने चारों ओर के घटनाक्रम पर कई तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। हर व्यक्ति में बहुत सारे तत्व होते हैं।

वह कई चीज़ों पर इमोशनली रिएक्ट करता है और कई चीज़ों को रेशनली देखता है। ऐसा नहीं है कि इंसान टोटली इमोशनल होता है या रेशनल। हर किसी का अभिव्यक्ति का माध्यम अलग होता है। मैंने अपनी बात कहने के लिए कार्टून माध्यम को उपयुक्त माध्यम समझा।" 

दरअसल राजेंद्र धोड़पकर की एक दोस्त फ़िल्म बना रही थीं और वे उनके लिए स्क्रिप्ट लिखने के लिए भोपाल से दिल्ली आए थे। फ़िल्म की टीम अपने काम में व्यस्त रहती थी और अकेलेपन में बोरियत उन्हें घेरने लगी। वे वापस भोपाल जाना नहीं चाहते थे। वे शौकिया कार्टून बनाने लगे।

'दिनमान' और 'जनसत्ता' में उनके कार्टून पसंद किए गए और वे वहं छपने लगे। इसके बाद वे एक्सप्रेस के लिए भी अरूण शौरी जी के साथ काम करने लगे। राजेंद्र कहते हैं कि इस तरह बहुत आसानी से उनकी गाड़ी चल पड़ी। उन्हें कोई ख़ास संघर्ष नहीं करना पड़ा। 

काव्य संग्रह 'दो बारिशों के बीच' से ही उनकी एक और कविता पर नज़र डालें : 'प्रेम कथा का अंत' 

मैंने तुमसे इस कदर प्रेम किया कि
इज़्ज़त की भी कोई परवाह नहीं की
लौटते हुए बची-खुची इज़्ज़त चौराहे पर
बेच दी और दो सिगरेटें खरीदीं
घर आकर लंबी तान कर सो गया

अगले दिन मैंने दोस्त से कहा
सोचता हूं सिगरेट पीना छोड़ दूँ
स्वास्थ्य भी खराब होता है और इज़्ज़त का
कचरा होता है सो अलग

ठीक यही विचार प्रेम के बारे में भी मेरे मन में आया
जब मैं
दोस्त के साथ सड़क पर घूम रहा था
हमने एक धर्मादा प्याऊ पर पानी पीया
उधारी में दो सिगरेटें लीं
उस साल बहुत ज़्यादा गर्मी पड़ी थी
बाद में मालूम हुआ गाँव में भारी अकाल पड़ा था

ठीक यही विचार प्रेम के बारे में मेरे मन में आया
मैंने उसे एक किताब में रख दिया और
भूल गया, लाइब्रेरी की किताब थी, वापस कर आया

तुम बहुत पहले शहर छोड़ कर चली गई थी
मैं भटकता रहा अकेलेपन में
फिर दोस्त मिला, भावुक होकर उसने कहा
मैं तुम्हारी ख़ातिर जान दे सकता हूं
उसने कहा- ऐसा मत करना
बचा ही क्या है तुम्हारे पास
सिर्फ़ जान ही तो है, वह भी दे दोगे
तो तुम्हारे पास कुछ नहीं रहेगा। 

राजेंद्र धोड़पकर की कविताओं का संग्रह 'दो बारिशों के बीच' 1987 तक उनकी लिखी गई कविता का संग्रह है। इससे पहले उनका काव्य संग्रह 'होना शुरू होना' प्रकाशित हो चुका था। 1983 में उन्हें कविता के लिए भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला। 

'दो बारिशों के बीच' संग्रह में राजेंद्र जी कहते हैं, "1987 के बाद के दौर में उन्होंने अख़बारी लेखन किया और कार्टून बनाए। इसके अलावा दूसरा लेखन कम किया। अख़बारी लेखन और कार्टून मेरे साहित्यिक लेखन और चित्रकारिता का ही मुझे विस्तार लगता है।

मैंने इसे रोज़ी रोटी की मजबूरी या गैर रचनात्मक या कम कम रचनात्मक काम नहीं मानता। इसके पहले मेरी अभिव्यक्ति मूलत: काव्यात्मक ही रही, मैंने कविताएं लिखीं और दूसरा साहित्यिक लेखन किया। मैं सिर्फ़ अपनी काव्य भाषा से असंतुष्ट था, इसलिए भाषा में नई अभिव्यक्तियां, नए इलाक़ो की खोज में पत्रकारिता में आया और यहां जब असंतुष्ट होता हूँ, तब अपनी काव्यभाषा से संदर्भ ग्रहण करता हूँ। 

राजेंद्र धोड़पकर ने मराठी से कविताओं और गद्य का अनुवाद किया। मलयाली कवि के सच्चिदानन्दन की कविताओं का अनुवाद किया और जिसकी किताब प्रकाशित हुई। राजेंद्र जी की कविताओं और गद्य का अंग्रेज़ी और कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

राजेंद्र जी के रचना क्षेत्र का दायरा बड़ा है। उन्होंने कई नाटक लिखे और उनका मंचन किया। कई लघु फ़िल्मों में टेलीविजन में धारावाहिक लिखे और निर्देशन में सहयोग किया। 'दो बारिशों के बीच' संग्रह से ही उनकी एक कविता 'ऊब' देखिए - 

एक ऊब थी जो धीरे-धीरे हमारे होने में शामिल थी 
जो घेर लेती थी किसी शोर की तरह बातचीत
के शब्दों को
और उन्हें थका कर चुप कर देती थी
शाम को काली छायाओं में बदलते पेड़ों पर सवार थी ऊब
प्रेम अक्सर बेहद ठण्डी हवा की तरह
दुखती पेशियों में झुरझुरी पैदा कर जाता था
प्रेम एक अजीब ढंग से हमारे होने को याद
दिलाता था
हमारे होने और उसके एहसास के बीच
जो खाली जगहें थीं वहाँ ऊब धूल और जालों की तरह
जमा हो रही थी। 

अक्सर शाम को एक शहर था जो बाज़ार ज़्यादा था
जिसमें भड़कीली रोशनियाँ फौलादी ठंडक में घिरी थीं
ठंडे फौलाद पर
पानी की लकीरों की तरह ऊब थी
जो रात तक फैली थी। 


राजेंद्र धोड़पकर की कविता - रात

रात 

एक प्रतीक्षा थी अँधेरे में
प्रतीक्षा को बचाना था ऊब से
प्रतीक्षा एक सड़क थी जिसके दोनों ओर
लगे पेड़
सुबह-सुबह ओस में भीगे ऐसे लगते थे
जैसे अपने अंकुर होने को याद कर रहे हों। 
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile

SATYENDRA KUMAR

121 कविताएं

View Profile