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संवेदनशील लेखक बनने में पत्रकारिता ने मेरी मदद की...

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                            मैं फरीदपुर (बांग्लादेश) के राजबाड़ी में पैदा हुआ। राजबाड़ी शहर चारों ओर से प्राकृतिक परिवेश से घिरा हुआ था। मेरे पिता स्वदेशी आंदोलन से जुड़े थे और पत्रकारिता भी करते थे। बचपन में मैं बहुत शर्मीला था, लेकिन किताबें मुझे अपनी ओर खींचती थीं। मैं नाना के यहां रहता था, जिनके पास बेहद समृद्ध पुस्तकालय था। मैंने वहां की तमाम किताबें पढ़ डालीं। आशुतोष मुखोपाध्याय की जीवनी पढ़कर मैंने हाई कोर्ट का जज बनने का फैसला किया, लेकिन माइकल मधुसूदन दत्त की जीवनी पढ़ने के बाद मैंने तय कर लिया कि मुझे कवि ही बनना है।
        
                                                    
                            

ग्रेजुएट होने के बाद मैंने बतौर पत्रकार अपना करियर शुरू किया। मैं आर्थिक तंगी के कारण एक साथ कई अखबारों में काम करता था। कोलकाता आने के बाद पहली बार रवींद्रनाथ की लेखनी ने मुझे बेहद आकर्षित किया और खाली वक्त में रवींद्र संगीत सुनना मेरी आदत बन गया। मैंने बांग्ला अखबार जुगांतर और फिर स्टेट्समैन में काम किया। उसके बाद आनंदबाजार पत्रिका समूह के अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान स्टैंडर्ड से जुड़ गया।

आखिर में मैं  आनंदबाजार पत्रिका का संयुक्त संपादक बना। तब कवि नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती और वरिष्ठ पत्रकार गौरकिशोर घोष जैसे लोग इस अखबार में मेरे सहयोगी थे। पत्रकारिता के अलावा साहित्य मुझे बेहद आकर्षित करता था। हालांकि एक लेखक के तौर पर मैंने कविता, नाटक और लेख में भी अपने हाथ आजमाए। लेकिन छोटी कहानी और उपन्यास-इन्हीं दो विधाओं में मैं आश्वस्त होकर लिख सकता था। एक तरफ जहां मुझमें एक लेखक की संवेदनशीलता थी, वहीं पत्रकारिता ने मुझे सामाजिक बुराइयों के खिलाफ और शोषित लोगों के पक्ष में लिखने के लिए प्रेरित किया।

-बांग्ला के चर्चित पत्रकार और लेखक
8 वर्ष पहले
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