जिंदगी मे कई बार ऐसा मौका आता है जब हम समझ नहीं पाते कि खुश हों, निराश हों या हैरान। कई बार हम दोराहे पर खड़े होते हैं, समझ नहीं पाते क्या सही है और क्या गलत, जिंदगी से हम चाहते कुछ और हैं और होता कुछ और है...तभी मन खुद से ही सवाल करता है क्या करें? हमने जिंदगी से ये तो नहीं चाहा था।
जब बात जिंदगी, जिंदगी के दर्द की हो तो मशहूर शायर, गीतकार, निर्देशक और पटकथा लेखक गुलज़ार (संपूर्ण सिंह कालरा) साहब से बेहतर जिंदगी को कौन समझ सकता है। हर एक सांस को जीने वाले गुलज़ार साहब ने जिंदगी की किताब को गीत में कई कई बार उकेरा है लेकिन जब मासूम फिल्म के गाने में वो जिंदगी से हैरान होने की बात करते हैं तो वहां मन का मंज़र ठहर कर जीवन दर्शन को समझने की कोशिश करता है।
मासूम फिल्म के गीत की सीरीज में आज मैं मेरे पसंदीदा गीत से आपको एक बार फिर मिलवा रही हूं, जिसे गुलज़ार साहब ने ठीक वैसा उकेरा है जैसे हम और आप जिंदगी से कहते तो हैं लेकिन फिर भी कह नहीं पाते हैं।
गुलज़ार एक ऐसे बेजोड़ गीतकार हैं कि वो जो शब्द रचते हैं वो शब्द सिर्फ उनके नहीं होते बल्कि हमारे आपके होते हैं। उसके इर्द-गिर्द हम और हमारी जिंदगी होती है। हर गीत को सुनने के बाद लगता है यही तो हम कहना चाह रहे थे। हमारी फिल्म इंडस्ट्री के शहंशाह हैं गुलजार...अब मासूम फिल्म का ये गीत सुनिए जो 1983 में भले रिलीज हुई थी लेकिन उसका हर गीत हर शब्द आज भी मौजूं है। आप खुश हों या निराश हों आप इस गीत को गुनगुनाए बिना नहीं रह सकते हैं...
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूं मैं
ओ हैरान हूं मैं
तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं
ओ परेशान हूं मैं
अब देखिए न आपने सोचा था क्या कि जीने के लिए जिंदगी के ऐसे-ऐसे दर्द संभालने होंगे जो आपने कभी सोचे न थे। कुछ ऐसे ही हैं गीत के बोल। जिसमें दिखाई भले ही नसीरउद्दीन शाह और जुगल हंसराज दे रहे हैं लेकिन बात वो हमारी और आपकी कह रहे हैं।
जीने के लिये सोचा ही न था, दर्द सम्भालने होंगे
मुस्कुराऊं तो, मुस्कुराने के कर्ज़ उठाने होंगे
मुस्कुराऊं कभी तो लगता है
जैसे होंठों पे कर्ज़ रखा है
तुझसे ...
हर कदम पर जिंदगी हमें दर्द देती है..मुस्कुराने की कोशिश कीजिए तो दिमाग में कहीं आता है कि कैसे हमारी जिंदगी में कर्ज है जिसे हमें ही उठाना है..मुस्कुराना भी भारी हो जाता है...हर एक शब्द जिंदगी के दर्द से भरा हुआ...।
नसीर अपने पुत्र बने जुगल को बोर्डिंग में लेकर जाते हैं जहां वो बहुत प्यार से कहता है कि वो उनके साथ दिल्ली रहना चाहता है..
मासूम PC: याहू लाइफ स्टायल इंडिया
आज अगर भर आई हैं, बूंदें बरस जायेंगी
कल क्या पता इनके लिये आंखें तरस जायेंगी
जाने कहां गुम कहां खोया
एक आंसू छुपाके रखा था
तुझसे ...
गीत के इस सीन में नसीर अपने पुत्र बने जुगल को बोर्डिंग में लेकर जाते हैं जहां वो बहुत प्यार से कहता है कि वो उनके साथ दिल्ली रहना चाहता है..लेकिन दिल्ली में तो नसीर का एक और परिवार है जो नसीर की इस सच्चाई से वाकिफ़ नही है...जुगल नसीर से लिपट जाता है...हम सबकी जिंदगी में है ऐसी दबी छुपी कहानियां...जिंदगी में कई बार हमारी आपकी कहानियां एक जैसी ही लगती हैं...तभी तो दिल कहता है
आज अगर भर आई हैं..बूंदें बरस जाएंगी, कल क्या पता जिनके लिए...आंखे तरस जाएंगी...जाने कहां बंद हुआ...कहां खोया एक आंसू छुपा कर रखा था...
ज़िन्दगी तेरे ग़म ने हमें रिश्ते नये समझाये
मिले जो हमें धूप में मिले छांव के ठंडे साये
ओ तुझसे ...
गीत के आखिरी बोल से तो हम सब जुड़े हुए हैं...जब गुलजार साब कहते हैं कि जिंदगी की समझ तो दुख में ही होती है..रिश्ते की समझ और रिश्ता क्या है इसकी जानकारी भी हमें सबसे ज्यादा दुख की घड़ी में ही होती है..
जुगल एक अच्छा पेंटर है और नसीर में वो अपने पिता की छवि पाता है ..तभी ये बोल शुरू होते हैं..अब ऐसे समय में नसीर समझ नहीं पाते कि वो क्या करें...उसे भी जुगल से प्यार है वो उसे छोड़ना नहीं चाहते लेकिन वो कुछ कर नहीं पाते हैं..बंधे बंधे से रहते हैं...कुछ ऐसी ही तो है हमारी आपकी जिंदगी भी...हमें भी जिंदगी के धूप छांव में जिंदगी की नाराजगी और हैरानी से गुजरना पड़ता है और हम समझ नहीं पाते हैं...कि हैरान हों या फिर नाराज़...
9 वर्ष पहले