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अब गाने सुने नहीं जाते...देखे जाते हैं...

काव्य डेस्क

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  ये ‘जवानी है दिवानी’ का ‘बदतमीज दिल माने न...’ ­­­­याद है आपको? या फिर ‘बलम पिचकारी...’ जरूर याद होगा। लेकिन क्या आप उसके गायकों को याद कर सकते हैं? ‘बजरंगी भाईजान’ के गाने, तो अभी बज भी रहे हैं, क्या याद कर पाएंगे ‘सेल्फी ले ले रे...’ को किसने आवाज दी थी। वास्तव में, यह स्वीकार करने में शायद ही किसी को आपत्ति हो कि गाने अब सुने नहीं जाते, देखे जाते हैं। जाहिर है जब गाने देखने के लिए बनाए जाएंगे, तो उसमें संगीत तत्व से ज्यादा महत्वपूर्ण दृश्य तत्व हो जाते हैं। फिल्मकारों को पता है कि यदि वरुण धवन और जैकलीन फर्नांडिस परदे पर ‘टन टनाटन टनटन तारा’ करते दिख जाएंगे, तो कोई यह जानने की कोशिश नहीं करेगा कि इस ‘टन टनाटन...’ में आवाज किसकी थी? संगीत किसका था? बोल किसके थे? आश्चर्य नहीं कि गाने भी अब फिल्म के साथ आते हैं और फिल्म के साथ ही चले जाते हैं।    
                                                              
                  

                    
                                        
                         
                                                                                   
                            
                         
                                                            
                                
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‘पद्मावत’ को आए और गए तो अभी महीने भी नहीं बीते, न तो संजय लीला भंसाली उसके विवादों से उबर सके हैं। न ही  रणबीर और दीपिका उसके सफलता की खुमारी से, लेकिन कहां गए ‘घूमर घूमर घूमर घूमे रे’ और कहां गए ‘खलीबली हो गया है दिल’ गाने वाले। शायद ही कोई याद कर पाता है। गाने याद कर भी लें, तो उसके गायकों के नाम याद नहीं आ सकते। अधिक समय नहीं बीता, जब हिन्दी सिनेमा में संगीत की अपनी सल्तनत थी। संगीतकार के नाम निर्देशक के बराबर रखे जाते थे, तो गायकों का महत्व सितारों से कम नहीं था। आज भी राजकपूर को शंकर-जयकिशन और मुकेश से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जब दिलीप साहब का नाम आता है, तो मोहम्मद रफी खुद-ब-खुद हमारे जेहन में आ जाते हैं। यह दौर तकरीबन 80 के दशक तक प्रभावी रहा, जब राजेश खन्ना की सफलता में किशोर कुमार के भी योगदान को रेखांकित किया जा रहा था।

हेमा मालिनी के लिए लता मंगेशकर और रेखा के लिए आशा भोसले की आवाज तय मानी जाती थी। वास्तव में, सिनेमा के आरंभिक दौर से ही इसके लिए संगीत की अनिवार्यता महसूस की गई। कहते हैं, जब सिनेमा मूक था, तब भी लाइव संगीत से इसे संवारने की कोशिश की जाती थी। बाद के दिनों में जब सिनेमा को आवाज मिली, तो अभिनेता होने की शर्त में गायक होना भी शामिल था। के.एल. सहगल उस पीढ़ी के प्रतिमान माने जा सकते हैं। यह सिलसिला पार्श्वगायन के आरंभ तक जारी रहा। बाद के दिनों में पार्श्वगायन ने सिनेमा संगीत को एक विशिष्ट और स्वतंत्र पहचान देने की शुरुआत की और सिनेमा संगीत में प्रशिक्षित गायकों की दखल बढ़ी।

यह वह दौर था, जब गाने पहले सुने जाते थे, फिल्म दर्शकों के सामने बाद में आती थी। कह सकते हैं, उस दौर में फिल्मों के प्रमोशन का एकमात्र विकल्प गाने ही थे। रेडियो सीलोन और विविध भारती के आय का सबसे बड़ा स्रोत उस समय फिल्मों के प्रमोशन ही थे। जाहिर है गानों की लोकप्रियता में किसी सितारे की भूमिका नहीं होती थी, बल्कि संगीतकार और गायक के बल पर लोकप्रिय गीत, अभिनेताओं की लोकप्रियता के लिए आधार तैयार करते थे। शायद यही कारण था कि उस दौर में अभिनेताओं द्वारा खास गायकों को अपनी पहचान के रूप में स्थापित कर लिए जाने का प्रचलन था। रेडियो पर गाने सुनकर ही अंदाजा लगा लिया जाता था कि इसे परदे पर राजकपूर ने गाया होगा या दिलीप कुमार ने। राजेन्द्र कुमार ने या शम्मी कपूर ने। गायकों से भी भरसक उम्मीद की जाती थी कि वे जिस अभिनेता के लिए आवाज दे रहे होंगे, उनके मैनरिज्म का निर्वाह करेंगे।

आश्चर्य नहीं कि मोहम्मद रफी जब भारत भूषण के लिए गाते थे, तो कुछ और होते थे और जब शम्मी कपूर के लिए गाते थे, तो कुछ और। वहीं, मुकेश, राजकपूर के लिए कुछ और सुनाई देते थे। मनोज कुमार के लिए कुछ और। किशोर कुमार के राजेश खन्ना के लिए गाए गीतों और देव आनंद के लिए गाए गीतों का फर्क समझने में आज भी मुश्किल नहीं होती। स्वाभाविक है गायकों को अपनी जवाबदेही का एहसास था। उन्हें पता था, उनकी आवाज से उनके सितारे को स्थापित होना है। इसके लिए वर्षों के रियाज के साथ एक-एक गीत पर उनके द्वारा मेहनत की जाती थी। जाहिर है अभिनेता के रूप में पीढ़ियां गुजर रही थी, लेकिन लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश, मन्ना डे, किशोर कुमार, आशा भोसले जैसे गायकों को चुनौती देने के लिए गायक सामने नहीं आ पा रहे थे। ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है’, सुनाई पड़ते ही मुकेश का नाम जेहन में आ जाता है। ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना..’ के साथ सिर्फ किशोर कुमार याद आते हैं।

‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’ पर कौन बेटी के पिता होंगे, जिसने आंसू नहीं बहाएं होंगे। इस गीत के साथ सिर्फ रफी ही याद आते हैं। वास्तव में, इसका कारण उनके संगीत के ज्ञान और समर्पण के साथ उनकी प्रकृति प्रदत्त आवाज   भी थी। 90 के दशक में म्यूजिक कैसेट के अवतरण के साथ ही नए गायकों की एक शृंखला तो आई, लेकिन अपनी स्वतंत्र पहचान की बजाय इन्होंने अपने आरंभिक दिनों में पुराने स्थापित गायकों की नकल से ही स्थापित होने की कोशिश की। हालांकि, बाद के दिनों में कुमार शानू, अनुराधा पौडवाल, सोनू निगम, कविता कृष्णमूर्ति, उदित नारायण, शान, श्रेया घोषाल जैसे गायकों ने पार्श्वगायन में अपनी स्वतंत्र पहचान भी कायम की। यह गायकी की विविधता ही थी, जिसने श्रेया और सुनिधि को अलग-अलग मुकाम पर स्थापित किया। शान और सोनू निगम को एक साथ लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया। लेकिन यह तब की बात थी, जब तक गायकों की गायकी उनकी आवाज और उनके संगीत की समझ पर निर्भर रहा करती थी। नई सदी के आरंभ में सिनेमा पर जैसे-जैसे तकनीक का दबाव बढ़ा, गायन जैसी विशुद्ध कला विधा भी उससे अक्षुण नहीं रह सकी।

एक शास्त्रीय गायक ने अपने परफॉर्मेंस की फीस की बात पर स्पष्ट कहा कि यदि आप मंच पर तानपूरा रखवाना चाहते हैं, तो उसके लिए अलग फीस लगेगी, क्योंकि उसे लाना आैर ले जाना मुश्किल होता है। अपना काम तो इलेक्ट्रॉनिक तानपूरे से ही चल जाता है। तानपूरा ही क्यों? अब तो अधिकांश शास्त्रीय वाद्य यंत्रों के इलेक्ट्रॉनिक संस्करण मौजूद हैं। जाहिर है सहूलियत के कारण संगीत में परंपरागत वाद्ययंत्रों का स्थान  मशीनी आवाजों ने ले लिया। रिकॉर्डिंग की आधुनिक सुविधाओं ने संगीतकारों और गायकों के ट्यूनिंग की जरूरत भी खत्म कर दी। यहां तक कि साथी गायकों की साथ उपस्थिति की अनिवार्यता भी जाती रही। धुन कभी रिकॉर्ड हो रहे हैं, तो गीत किसी और दिन, किसी ने आज रिकॉर्डिंग करवाई, तो कोई तीन दिन बाद। तकनीक ने सहूलियतें अवश्य बढ़ाईं, लेकिन इस सबके बीच संगीत की अहमियत भी जाती रही। यह वह पीढ़ी है, जिसने कमोबेश गायन का ज्ञान ‘कराओके’ पर रियाज कर हासिल किया है।

इसका एक अहम कारण फिल्मी गानों की बढ़ती दृश्यता भी है। चैनलों के विस्तार में गीत अब सुने नहीं, देखे जाने लगे हैं। श्रोताओं को गीत सुनकर अंदाजा नहीं लगाना था कि परदे पर राजकपूर होंगे या मनोज कुमार। वे शाहरुख खान को गाते हुए देख रहे थे, उनके लिए यह जानने की कोई जरूरत ही नहीं थी कि परदे के पीछे कौन है?  फिल्मकारों को भी एहसास हो गया था कि जब गाने भी सितारों से बिकने हैं, तो क्यों पार्श्वगायकों की पहचान को अहमियत दी जाए। सलमान खान जब ‘मैं हूं हीरो तेरा’ गाते हैं, तो गाने के सुर पर किसका ध्यान जाता है। इस स्थिति में कहते हैं कि लगभग 200 डॉलर के एक मशीन ने क्रांतिकारी भूमिका अदा की। ‘मेलोडाइन’ कही जाने वाली यह डिजिटल मशीन आवाज, पिच और स्केल तक दुरुस्त करने की क्षमता रखती है। इस मशीन ने गायक होने के लिए गायक होने की जरूरत ही खत्म कर दी।

प्रोफेशनल गायकों को तो छोड़ ही दें, ऋतिक रोशन, रणवीर कपूर से लेकर संजय दत्त तक अब गानों को अपनी आवाज दे रहे हैं। सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा, आलिया भट्ट, फरहान अख्तर, श्रद्धा कपूर जैसे अभिनेताओं ने बकायदा गायक के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश की है। श्रद्धा कपूर ने तो फेवरेट सेलिब्रिटी सिंगर का कोई अवॉर्ड भी हासिल कर लिया है। एक समय में टेलीविजन पर लोकप्रिय रहे शेखर सुमन ने भी गायकी में हाथ आजमाने की कोशिश करते हुए एक निजी अलबम भी निकाल चुके हैं। वाकई नॉन सिंगर धनुष की ‘कोलावरी डी’ आज कोई आश्चर्य नहीं लगती।

25,000 में माने थे बड़े गुलाम अली साहब

बात है वर्ष 1960 में आई फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ की। फिल्म के निर्देशक के. आसिफ चाहते थे कि उनके इस ड्रीम प्रोजेक्ट में कोई भी कमी न रहे। सदाबहार गीतों की धुन को संगीतकार नौशाद ने बनाया और लता मंगेशकर, शमशाद बेगम तथा मोहम्मद रफी जैसे दिग्गजों ने अपनी आवाज से उसे सजाया। आसिफ चाहते थे कि फिल्म में दो गाने बड़े गुलाम अली खां साहब के भी हों, लेकिन खां साहब फिल्मों में गीत गाना पसंद नहीं करते थे। जब के. आसिफ ने उनसे फिल्म में राग पर आधारित ‘प्रेम जोगन बन के’ व ‘शुभ दिन आयो राज दुलारा’ गाने का अनुरोध किया, तो इनकार करने की नीयत से खां साहब ने उनसे मेहनताने के तौर पर एक गाने के 25,000 रुपये मांग लिए। उन्हें लगा कि यह सुनकर के. आसिफ लौट जाएंगे। यह वह दौर था, जब लता और रफी जैसे गायकों को एक गाने का 200-250 रुपये मिलता था। लेकिन के. आसिफ भी जिद के पक्के थे। उन्होंने खान साहब की मांग के मुताबिक, पैसे दिए आैर उनसे गवाकर ही दम लिया।     
 

गिलास को चम्मच से बजाकर बनी थी धुन

आर.डी. बर्मन प्रयोग करने के हमेशा हिमायती थेे और यह उनके संगीत में नजर भी आता है। उन्होंने वेस्टर्न, लेटिन, अरेबिक और भारतीय संगीत को मिलाकर नई धुनें बनाईं। वर्ष 1973 में फिल्म ‘यादों की बारात’ के गाने ‘चुरा लिया है तुमने’ के लिए आर.डी. कुछ नया करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने गिलास को चम्मच से बजाकर एक अद्भुत धुन बनाई। इसी तरह वर्ष 1977 में फिल्म ‘डार्लिंग डार्लिंग’ के एक गीत ‘रात गई बात गई’ के लिए उन्होंने अपने अरेंजर से शर्ट निकालने को बोला। इसे सुनकर सबको थोड़ा अटपटा लगा, लेकिन उनके शर्ट निकालते ही आर.डी. बर्मन ने अरेंजर की पीठ पर थाप देना शुरू कर दिया, जिससे फिल्म की धुन बनी।
 
7 वर्ष पहले
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