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आजा सांझ हुई मुझे तेरी फ़िकर...

हरि कर्की

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  हमारे पास समय के साथ ऐसे अनुभव होते जाते है जिन्हें अपने भीतर महसूस करके हम उस चेतना, ऊष्मा या रौशनी से मिल पाते है जो हमें इंसान बनाती है। आम दिनों में ऐसे ही बेहद मामूली से प्रतीत होते अनुभव हमारे भीतर बड़े बदलाव करते हैं। हम जिस सूरज को रोज देखते है वो ऐसे ही एक दिन उगते हुए अचानक ज़्यादा करीब महसूस होता है और शीतल भी। इसी तरह जिन गीतों, धुनों या आवाज़ों को हम आज तक केवल सुन रहे होते हैं वो सब भी एक शाम, चाय में घुली इलायची के स्वाद को पहचान लिए जाने की तरह ही हमारे भीतर संगीत के स्वाद की पहचान को जगा देती है।

हम सब की चेतनाओं में ऐसे ही अलग-अलग अनुभवों के चित्र होते हैं। जो हमें रूकने नहीं देते, हमें बेहतर करते जाते हैं औेर हम लगातार यात्रा करते हुए उस ओर पहुंचने की कोशिश करते जाते हैं जहां हर तरह की हिंसा और अति की कोई जगह नहीं होती।
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आज पेश है ऐसा ही एक अजीज़ गीत जिसका चित्र और जिसका रंग रोज़ उजाला होते ही मन में उभर आता है। गीत है 2006 में आई फिल्म 'रंग दे बसंती' का जिसके बोल थे 'लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जा ना।' इस फ़िल्म का निर्देशन किया था राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने। युवाओं को केंद्र पर रखकर बनायी गई ये फ़िल्म अपने गीतों और संगीत के लिए भी याद की जाती है। 

हम सबने बचपन में लुका छुपी का खेल ज़रूर खेला होगा। लुका छुपी बच्चों का एक पसंदीदा खेल है जिसमें मां-बाप को विश्वास होता है कि बच्चे को ढूंढ़ लिया जाएगा। बच्चे भी खेल-खेल में ऐसी जगह पर छुपने कोशिश करते हैं जहां उन्हें कोई ना ढूंढ़ पाए। इसी खेल के बोल से शुरू होता ये गीत।

ऑस्कर के लॉग लिस्ट के लिए नॉमनेट हुआ यह गीत एक मां द्वारा अपने बेटे को हमेशा के लिए खो देने, उसे फिर कभी ना मिल पाने के दर्द और लुका छुपी के खेल में हमेशा के लिए खो गए बेटे से संवाद को बेहद संजीदगी से दिखाता है।

लुका छुपी बहुत हुई
सामने आ जा ना
कहां-कहां ढूंढा तुझे
थक गई है अब तेरी मां
आजा सांझ हुई
मुझे तेरी फिकर धुंधला गयी
देख मेरी नज़र आ जा ना
आजा सांझ हुई
मुझे तेरी फिकर धुंधला गयी
देख मेरी नज़र आ जा ना

गिटार की धुन के साथ शुरू होता ये गीत पहले बोल से ही बेटे को खोजती थकी चुकी मां के दुख को बखूबी दिखा देता है। एक मां की चिंता, शाम हो आने का ख़्याल, बेटे के गुम हो जाने का डर और मन ही मन में कभी ना लौट के आने वाले उस बेटे की वापस लौट आने की आशा रह-रह कर गीत सुनने वाले की आंखों को नम कर देती है।

रंग दे बसंती फिल्म के इस गीत को भारत रत्न लता मंगेशकर ने ए.आर. रहमान के साथ मिलकर आवाज़ दी है। इसका संगीत ए.आर. रहमान ने दिया है और गीत लिखा है प्रसून जोशी ने। प्रसून जोशी इस गीत को लता जी की आवाज़ में सुनकर ख़ुद को रोने से रोक नहीं पाए थे।

क्या बताऊं मां कहां हूं मैं
यहां उड़ने को मेरे खुला आसमां है
तेरे किस्सों जैसा भोला सलोना जहां है
यहां सपनो वाला
मेरी पतंग हो बेफिक्र उड़ रही है मां
डोर कोई लुटे नहीं बीच से काटे ना

गीत का अगला हिस्सा जहां बेटा अपनी घबराई मां को हौसला बंधाता बता रहा है कि मां मैं जहां भी हूं आज़ाद हूं। दूर हूं लेकिन तू ने बचपन से जिन ख़ूबसूरत सपनों जैसे किस्सों को मेरे मन में सजाया था मैं उन्हीं जगहों में उड़ रहा हूं और यहां किसी तरह का डर नहीं है। कोई लुटेरा नहीं है जो मेरे सपने को तोड़कर ले जाए। तुम उन्हीं सपनों में मुझे उड़ते देखना मां।

आजा सांझ हुई
मुझे तेरी फिकर धुंधला गयी
देख मेरी नज़र आ जा ना
तेरी राह ताके अंखियां
जाने कैसा कैसा होए जिया
तेरी राह ताके अंखियां
जाने कैसा कैसा होए जिया
धीरे-धीरे आंगन उतरे अंधेरा
मेरा दीप कहां
ढलके सूरज करे इशारा चंदा तू है कहां
मेरे चंदा तू है कहां

मां जानती है उसका बेटा अकेला है चाहे वो उसका दिल रखने को कितना कहे कि वो ख़ुश है। एक मां समझती है अंधेरा होने पर बेटा उसको खोजेगा और ना मिलने पर घबराएगा, डरेगा। इसलिए उसको वापस आ जाना चाहिए। कैसी फ़िक्र है ये, कैसा प्यार है ये एक मां का जो संसार की किसी भी बात के आगे कम नहीं होता। कौन-सी ताकत है जो एक मां को ऐसा निश्छल प्रेम कर पाने देती है।

कैसे तुझको दिखाऊं यहां है क्या
मैंने झरने से पानी मां तोड़ के पिया है
गुच्छा गुच्छा कई ख्वाबों का उछल के छुआ है
छाया लिया भली धुप यहां है
नया नया सा है रूप यहां
यहां सब कुछ है मां फिर भी
लगे बिन तेरे मुझको अकेला
हो...

आख़िर में बेटा मां को कह देता है कि मां मैंने झरने से पानी तोड़ के भी पीया, ख़्वाबों को उछल के छुआ और छाया संग लिए हुई सुनहरी धूप में भी घूमा। इन सपनों जैसी सभी बातों के होते हुए भी मां तेरे बिना मैं बहुत अकेला हूं।

प्रसून का लिखा यह गीत पहले ही वाक्य से ऐसी अतियथार्थ उपमाओं को आपके साथ लेकर चलता है कि आप एक क्षण को भी गीत से अलग होने की कोशिश नहीं कर सकते। गीत के आख़िरी हिस्से में तबले, हारमोनियम और बांसुरी के साथ गायी गई सरगम गीत को आख़िर तक दिलों से जोड़े रखती है। 

आख़िर में छोड़ जाते है आपको उस गीत के वीडियो के साथ - 
6 वर्ष पहले
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