प्रसून जोशी एक गीतकार व कवि के रूप में मशहूर हैं। उन्होंने कई प्रसिद्ध विज्ञापन भी लिखे हैं। उन्हें कला व साहित्य में योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। श्रेष्ठ गीतकार के तौर पर उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके लिखे गीत आपने फ़िल्म तारे ज़मीन पर, ग़जनी, नीरजा, मणिकर्णिका आदि में सुने होंगे। उनके कुछ चुनिंदा गीत यहां पढ़ें
फ़िल्म - नीरजा (2016)
कहता ये पल, ख़ुद से निकल, जीते हैं चल
ग़म मुसाफ़िर था जाने दे, धूप आँगन में आने दे
जीते हैं चल, जीते हैं चल, जीते हैं चल
तलवों के नीचे है ठंडी-सी एक धरती
कहती है आजा दौड़ेंगे
यादों के बक्सों में ज़िन्दा-सी खुशबू है
कहती है सब पीछे छोड़ेंगे
उँगलियों से कल की रेत बहने दे
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सैय्याँ छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे, देवर समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का अंगना
भावे डेरा पिया का हो
सास गारी देवे...
सैय्याँ हैं व्यापारी, चले हैं परदेस
सुरतिया निहारूँ, जियारा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे...
देखो इन्हें ये हैं ओस की बूँदें
पत्तों की गोद में आसमां से कूदे
अंगड़ाई लें फिर करवट बदल कर
नाज़ुक से मोती हंस दे फिसल कर
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर
ये तो हैं सर्दी में धूप की किरणें
उतरें जो आँगन को सुनहरा सा करने
मन के अंधेरो को रोशन सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रंगत बदल दें
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर
मेरे हाथ में तेरा हाथ हो
सारी जन्नतें मेरे साथ हो
तू जो पास हो फिर क्या ये जहाँ
तेरे प्यार में हो जाऊं फ़ना
तेरे दिल में मेरी साँसों को पनाह मिल जाए
तेरे इश्क में मेरी जां फ़ना हो जाए
जितने पास हैं खुशबू साँस के
जितने पास होठों के सरगम
जैसे साथ हैं करवट याद के
जैसे साथ बाहों के संगम
जितने पास-पास ख़्वाबों के नज़र
उतने पास तू रहना हमसफ़र
तू जो पास...
लुका छुपी बहुत हुई सामने आ जा ना
कहाँ-कहाँ ढूँढा तुझे
थके है अब तेरी माँ
आजा सांझ हुई मुझे तेरी फिकर
धुंधला गयी देख मेरी नज़र आ जा ना
लुका छुपी...
क्या बताऊँ माँ कहाँ हूँ मैं
यहाँ उड़ने को मेरे खुला आसमाँ है
तेरे किस्सों जैसा भोला सलोना जहां है
यहाँ सपनों वाला
मेरी पतंग हो बेफिक्र उड़ रही है माँ
डोर कोई लुटे नहीं, बीच से काटे ना
आजा सांझ हुई..