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57 वर्ष हुए मगर राष्ट्रीय पर्वों पर आज भी हर ओर गूँजता है यह गीत

कुमार ललित

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती 
मेरे देश की धरती..
 
बैलों के गले में जब घुंघरू 
जीवन का राग सुनाते हैं 
ग़म कोसों दूर हो जाता है 
खुशियों के कमल मुस्काते हैं
 सुन के रहट की आवाजें 
यूँ लगे कहीं शहनाई बजे 
आते ही मस्त बहारों के
 दुल्हन की तरह हर खेत सजे 
मेरे देश की धरती..



वर्ष 1967 में मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' के लिए माँ भारती के गौरव-गान से जुड़ा यह कालजयी गीत लिखा था मशहूर गीतकार गुलशन बावरा ने। 57 वर्ष बीत गए मगर हर राष्ट्रीय पर्व पर आज भी यह गीत देश के कोने कोने में गूँजता है और करोड़ों लोगों के दिलों में देश के प्रति अनुराग की हिलोर जगाता है। 

आज इस गीत की चर्चा इसलिए क्योंकि आज ही के दिन 07 अगस्त, 2009 को इस गीत के रचनाकार गुलशन बावरा जी हम सब को छोड़कर हमेशा के लिए चले गए थे। 
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बचपन में झेला था बँटवारे का दंश

गुलशन बावरा के नाम से मशहूर हुए गुलशन मेहता का जन्म अविभाजित भारत के शेखुपुरा में 12 अप्रैल, 1937 को हुआ था। जब भारत का विभाजन हुआ तो मात्र 10 साल की उम्र में गुलशन बावरा जी को बँटवारे का दंश झेलना पड़ा। अपनी आँखों के सामने अपने माँ-बाप और चाचा का क़त्ल होते देखकर गुलशन बिलख उठे। यह दारुण दृश्य और इससे उपजी करुणा उनके भीतर कहीं गहरे समा गई। 

अपने लोगों, अपनी मिट्टी और अपनी भारत माँ के प्रति इसीलिए उनके मन में गहरी भावुकता हमेशा बनी रही। फिल्म उपकार के लिए मनोज कुमार जी ने जब उन्हें गीत लिखने का प्रस्ताव दिया तो यही भावुकता तरल होकर गीत में ढल गई। 

मिला फिल्म फेयर मगर हो गई अनबन

फिल्म उपकार के इस गीत के लिए गुलशन बाबरा को फिल्म फेयर अवार्ड मिला मगर पुरस्कार मिलने के बाद मनोज कुमार से ही अनबन हो गई। हुआ ये कि मनोज कुमार ने उन्हें ताना दिया कि मैंने ही तुम्हें फिल्मों में गीत लिखने का मौका दिया और मेरे कारण ही तुम्हें फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। यह उलाहना एक स्वाभिमानी गीतकार को खल गया। गुलशन बाबरा ने ज़वाब देते हुए मनोज कुमार से कहा कि मैं अच्छे गीत लिखता था, इसलिए तुमने मुझे अवसर दिया और मैंने फ़िल्म की माँग के अनुरूप बेहतर गीत लिखा, इसलिए मुझे फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। 

देशवासियों के हित में कर गए देहदान

गुलशन बावरा अपने देश और देशवासियों से सच्चा प्यार करते थे। वह जानते थे कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में बेहतर निदान हेतु निरंतर शोध-कार्य के लिए मानव देह की आवश्यकता होती है। इसलिए वे देहदान कर गए। उनकी इच्छानुसार उनके परिजनों द्वारा उनकी मृत देह को मुंबई स्थित जेजे अस्पताल में शोध के लिए दान कर दिया गया।

70 फिल्मों के लिए लिखे 250 गीत

गुलशन बाबरा की माँ विद्यावती धार्मिक विचारों की थीं। वह भजन मंडली में जाती थीं और गुलशन को साथ ले जाती थीं। गुलशन भी साथ में भजन गाते थे और कभी-कभार किसी भजन में एक आध पंक्ति अपनी ओर से जोड़ देते थे। यही वह वक्त था जब उनके भीतर एक गीतकार ने करवट लेना शुरू कर दिया था।

गीत लेखन के साथ अभिनय कौशल व गायकी के लिए जाने पहचाने गए गुलशन बावरा ने लगभग 45 वर्षों के फिल्मी करियर में 70 फिल्मों के लिए 250 गीत लिखे। इनमें वर्ष 1959 में फिल्म चंद्रसेना के लिए लिखे पहले गीत के साथ सट्टा बाजार, जंजीर, सनम तेरी कसम, अगर तुम न होते, सत्ते पे सत्ता, ये वादा रहा, हाथ की सफाई, रफू चक्कर, उपकार, त्रिमूर्ति, खलीफा, कसमे वादे और खेल-खेल में जैसी तमाम लोकप्रिय फ़िल्में शामिल हैं।  फिल्म जंजीर के लिए लिखे गए हिट गीत 'यारी है ईमान मेरा' गीत के लिए भी आपको फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।
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