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57 वर्ष हुए मगर राष्ट्रीय पर्वों पर आज भी हर ओर गूँजता है यह गीत

मेरे अज़ीज़ फिलमी नग़्मे
                
                                                         
                            मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती 
                                                                 
                            
मेरे देश की धरती..
 
बैलों के गले में जब घुंघरू 
जीवन का राग सुनाते हैं 
ग़म कोसों दूर हो जाता है 
खुशियों के कमल मुस्काते हैं
 सुन के रहट की आवाजें 
यूँ लगे कहीं शहनाई बजे 
आते ही मस्त बहारों के
 दुल्हन की तरह हर खेत सजे 
मेरे देश की धरती..



वर्ष 1967 में मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' के लिए माँ भारती के गौरव-गान से जुड़ा यह कालजयी गीत लिखा था मशहूर गीतकार गुलशन बावरा ने। 57 वर्ष बीत गए मगर हर राष्ट्रीय पर्व पर आज भी यह गीत देश के कोने कोने में गूँजता है और करोड़ों लोगों के दिलों में देश के प्रति अनुराग की हिलोर जगाता है। 

आज इस गीत की चर्चा इसलिए क्योंकि आज ही के दिन 07 अगस्त, 2009 को इस गीत के रचनाकार गुलशन बावरा जी हम सब को छोड़कर हमेशा के लिए चले गए थे।  आगे पढ़ें

बचपन में झेला था बँटवारे का दंश

2 वर्ष पहले

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