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प्रीत की बरखा में भीगते मन की पुकार- 'मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे'

हरि कर्की

Mere Azeez Filmi Nagme
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                                                  जीवन प्रकृति का दिया एक अनमोल तोहफ़ा है। इस जीवन का महत्व उन पलों में समझ आता है जब एक रोज़ गर्म दोपहर किसी लम्बे ख़त्म ना होते रास्ते में एक बूढ़ा पेड़ दिखता है और हम रुक कर उसकी छांव में आराम पाते हैं। जब साल भर के इंतज़ार के बाद दोबारा आम का स्वाद मिलता है या जब सावन के काले मेघ से धरती की ओर गिरती हुई छोटी-छोटी बूंदें चेहरे पर पड़ती हैं।

तेज हवा के झोकों के साथ मिलकर फूलों के तीर की भाँति तिरछी बारिश की बूंदें भीगने का ऐसा अनुभव कराती हैं कि हम भीतर तक ठंडक महसूस करते हैं। और जब ऐसे अनुभवों के दिन दूर होते हैं तो मन ऐसे पलों को याद करता है, भीतर से उन दिनों को पुकारता है, दौड़ पड़ता है स्मृतियों के जंगल की ओर बारिश की आशा में और मन सिहर उठता है फिर से ऐसे दिनों को याद कर के।
 
मेघा रे मेघा रे, मेघा रे मेघा रे
मत परदेस जा रे
आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे
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"मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे" गीत 1981 में आई 'प्यासा सावन' फिल्म का हिस्सा है। जिसका संगीत मशहूर संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया और इस गाने को लिखा था संतोष आनंद ने। गीत में जो मधुर आवाज़ें मन को भीतर तक भीगा देती हैं वो आवाज़ें हैं भारत रत्न लता मंगेशकर और आवाज़ के जादूगर सुरेश वाडकर की।
 
बरसने लगी हैं बूँदें तरसने लगा है मन
हो, ज़रा कोई बिजली चमकी लरज़ने लगा है मन
और न डरा तू मुझको ओ काले काले घन
मेरे तन को छू रही है प्रीत की पहली पवन
हो, मेघा रे मेघा रे
मेरी सुन ले तू सदा रे
आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे

हो मेघा रे मेघा रे ...

लता मंगेशकर की आवाज़ में आलाप के साथ शुरू होता ये गीत पहले पल से ही ऐसे काल्पनिक ठाँव ले चलता है जहाँ मानो ऊपर आसमान में बादल बिना किसी रोक-टोक सैर कर रहें हों और सामने किसी तालाब में पानी की गिरती बूंदें हर पल के साथ आस पास फैले दर्द को, तकलीफ़ को दूर कर रही हों और आप ऐसे ही भीगते हुए, मन ही मन बादलों से कह रहे हों कि इस समय को ऐसे ही हमेशा के लिए रोक दिया जाए, बादलों को कहीं न जाने दिया जाए, जीवन का ये खूबसूरत पल ऐसे ही जज़्ब रह जाए, मेघा ऐसे ही आसमान से प्रेम बरसाए।  

ये हम इंसानों का स्वभाव है कि हर वो पल, जगह और शख़्स जिसे हम प्रेम करते हैं, जो हमारे हृदय के क़रीब होते हैं, ऐसे पलों और अनुभवों की स्मृतियों को हम दूर जाने नहीं देना चाहते हैं, उन्हें हमेशा आस पास ही रखना चाहते हैं, और जब ऐसा होना संभव न हो तो हम ऐसे ही किसी मौसम, किसी गीत या किसी जगह से उन यादों को जोड़ देते हैं और समय-समय पर लौट आते हैं उस पल ही छाँव में आराम करने या उस स्वाद के साथ उस मुस्कुराहट को भी महसूस करने या बारिश में भीग कर उस रोज़ की तरह कपकपाहट के साथ ऐसा ही कोई गीत गुनगुनाने।

आगे छोड़ जातेे हैं आपको उसी गीत के साथ -- 

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