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प्रीत की बरखा में भीगते मन की पुकार- 'मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे'

मेघा रे मेघा रे मत परदेस जा रे
                
                                                         
                            जीवन प्रकृति का दिया एक अनमोल तोहफ़ा है। इस जीवन का महत्व उन पलों में समझ आता है जब एक रोज़ गर्म दोपहर किसी लम्बे ख़त्म ना होते रास्ते में एक बूढ़ा पेड़ दिखता है और हम रुक कर उसकी छांव में आराम पाते हैं। जब साल भर के इंतज़ार के बाद दोबारा आम का स्वाद मिलता है या जब सावन के काले मेघ से धरती की ओर गिरती हुई छोटी-छोटी बूंदें चेहरे पर पड़ती हैं।
                                                                 
                            

तेज हवा के झोकों के साथ मिलकर फूलों के तीर की भाँति तिरछी बारिश की बूंदें भीगने का ऐसा अनुभव कराती हैं कि हम भीतर तक ठंडक महसूस करते हैं। और जब ऐसे अनुभवों के दिन दूर होते हैं तो मन ऐसे पलों को याद करता है, भीतर से उन दिनों को पुकारता है, दौड़ पड़ता है स्मृतियों के जंगल की ओर बारिश की आशा में और मन सिहर उठता है फिर से ऐसे दिनों को याद कर के।
 
मेघा रे मेघा रे, मेघा रे मेघा रे
मत परदेस जा रे
आज तू प्रेम का संदेस बरसा रे
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6 वर्ष पहले

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