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पहले, रौनक-अफ़रोज़ दयार थे जहां।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उस राह पे भी चलके देखा, खार थे जहां।
        
                                                    
                            
मैं गुजरा हूं वहां से भी , मंझधार थे जहां।।

एक अजीब सी खुशबू,आयी थी मुझको।
वो मेरा घर , और दर-ओ-दीवार थे जहां।।

क़ातिलों की पनाहगाह,बना हुआ है अब।
कल, मुंसिफ और उसके दरबार थे जहां।।

वहां किसने , मेरी जानिब उछाले पत्थर।
वो भीड़ और वो जगह, मेरे यार थे जहां।।

उन राहों से, किनारा कर लिया है उसने।
वो उल्फत और वफ़ा के मज़ार थे जहां।।

वहां बज़्म सजे या मातम,सरोकार नहीं।
हम उसकी नजरों से,दरकिनार थे जहां।।

उन गलियों से गुजरे,तो कैसा लगा,बता।
वो मेरी रूस्वाईयों के, इश्तहार थे जहां।।

अब कुरबतों के नग्म़ें,गुनगुना रहे हैं वो।
कल तक, यूं फांसले-ओ-दरार थे जहां।।

फकत , रस्म पूरी करी जा रही है अब।
अभी तक हक़-ओ-इख़्तियार थे जहां।।

बड़ा पुरखतर सन्नाटा छाया है वहां पे।
पहले, रौनक-अफ़रोज़ दयार थे जहां।।
-यूनुस खान
4 दिन पहले
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