फिर से, बज़्म सजाने लगा है वो।
किसे, आवाज लगाने लगा है वो।।
हद-ए-निगाह तक कोई नहीं, तो।
क्यूं , खुद को जगाने लगा है वो।।
जुगनुओं पे उसे भरोसा ही नहीं।
यूं ही, चिराग जलाने लगा है वो।।
ख़ामोशियों से, आजिज आकर।
शायद मुझे यूं बुलाने लगा है वो।।
-यूनुस खान