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ख़ामोशियों से, आजिज आकर।

                
                                                         
                            फिर से, बज़्म सजाने लगा है वो।
                                                                 
                            
किसे, आवाज लगाने लगा है वो।।

हद-ए-निगाह तक कोई नहीं, तो।
क्यूं , खुद को जगाने लगा है वो।।

जुगनुओं पे उसे भरोसा ही नहीं।
यूं ही, चिराग जलाने लगा है वो।।

ख़ामोशियों से, आजिज आकर।
शायद मुझे यूं बुलाने लगा है वो।।
-यूनुस खान
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7 घंटे पहले

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