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किसी तहरीर से मन बहलता नहीं है अब।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जुस्तजू -ए-मंज़िल-ओ -मकाम की तलब।
        
                                                    
                            
हो जैसे किसी प्यासे को जाम की तलब।।

किसी तहरीर से मन बहलता नहीं है अब।
हर वक्त बनी रहती तेरे पैग़ाम की तलब।।
-यूनुस खान
2 घंटे पहले
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