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Rakesh Dhar Dwivedi poetry: तुम नदिया की निर्मल धारा

कविता
                
                                                         
                            तुम नदिया की निर्मल धारा
                                                                 
                            
मैं समुद्र का अतृप्त किनारा।
यह तो बताओ कैसे मिलकर
ये क्षीर का सागर बना होगा।

अधर तुम्हारे अमृत रस के प्याले,
मैं अमृत रस का प्यासा।
यह तो बताओ इन अधरों का,
आचमन कैसे होगा।

नयन तुम्हारे खंजन जैसे,
मैं इसमें गिर डूब गया।
यह तो बताओ इन नयनों में
कैसे मेरा रूप सजेगा?

मैं विरह का गीत पुराना,
तुम गीतों की राजकुमारी।
अधरों पर आकर के कैसे
ये प्रेम का गीत मेरा सजेगा?

तुम नदिया की निर्मल धारा,
मैं समुद्र का अतृप्त किनारा।
यह तो बताओ कैसे मिलकर
यह क्षीर का सागर बनेगा।

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2 घंटे पहले

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