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तू सच्ची दलील दे, निजाम की बात कर।।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी तो मंज़िल-ओ-मकाम की बात कर।
        
                                                    
                            
दर-ए-मयकदे आकर, जाम की बात कर।।

शब-ए-फुर्कत कैसे गुज़री , पूछ ना हमसे।
ऐ सहर के मेहमां अब शाम की बात कर।।

ये जख़्म, ये दर्द, और चारागर की बेरुखी।
गर मुमकिन हो , इन तमाम की बात कर।।

आगाज़ हुए, एक तवील मुद्दत हो गयी है।
मेरा इम्तिहान न ले,अंजाम की बात कर।।

ओ इक तरफा वफ़ा की बात करने वाले।
तू सच्ची दलील दे, निजाम की बात कर।।
-यूनुस खान
5 घंटे पहले
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