कभी तो मंज़िल-ओ-मकाम की बात कर।
दर-ए-मयकदे आकर, जाम की बात कर।।
शब-ए-फुर्कत कैसे गुज़री , पूछ ना हमसे।
ऐ सहर के मेहमां अब शाम की बात कर।।
ये जख़्म, ये दर्द, और चारागर की बेरुखी।
गर मुमकिन हो , इन तमाम की बात कर।।
आगाज़ हुए, एक तवील मुद्दत हो गयी है।
मेरा इम्तिहान न ले,अंजाम की बात कर।।
ओ इक तरफा वफ़ा की बात करने वाले।
तू सच्ची दलील दे, निजाम की बात कर।।
-यूनुस खान
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