ये पेंच-ओ-ख़म, और सवालात जिंदगी के।
कितने उलझ गये हैं,ये हालात जिंदगी के।।
अपनों के दिये जख़्मों के निशां नहीं होते।
ख़ुद-ब-ख़ुद घायल हैं,जज़्बात जिंदगी के।।
कभी बज़्म कभी मातम भी देखे हैं हमने।
कहां ले आये हमे,ये मक़ामात जिंदगी के।।
-यूनुस खान