विज्ञापन

कोई दर, कोई ठिकाना है नहीं अपना।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब से तेरी आमद का पैग़ाम मिला है।
        
                                                    
                            
दिल की बेकरारी को आराम मिला है।।

कोई दर, कोई ठिकाना है नहीं अपना।
दीवानों को कब दर-ओ-बाम मिला है।।
-यूनुस खान
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6915 कविताएं

View Profile

MURLI music

60 कविताएं

View Profile