हिज़्र का इज़हार किया नहीं हमने।
सब्र को शर्मसार किया नहीं हमने।।
जो ग़म था , सीने में छुपाये रक्खा।
अश्कों को बेदार किया नहीं हमने।।
बेशक, तूने तग़ाफ़ुल से देखा मुझे।
तुम्हें , दरकिनार किया नहीं हमने।।
तन्हा हूं , खुद से करता हूं गुफ्तगू।
गैरों का एतबार किया नहीं हमने।।
हर मलाल की, पर्दे दारी निभायी।
यूं, हदों को पार किया नहीं हमने।।
-यूनुस खान