विज्ञापन

हर शै

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या हुआ, कि हर शै बेजान लगती है।
        
                                                    
                            
मायूसियों से , जान-पहचान लगती है।।

मेरी किसी बात का, जवाब नहीं देती।
तस्वीर भी,तेरी तरह नादान लगती है।।

मेरी सारी हसरतें, अब काबू में हैं मेरे।
कितनी मुख्तसर, हर उड़ान लगती है।।

सुकून-ए-कल्ब का,सबब थी कल जो।
वो शाम भी, अब तो वीरान लगती है।।

तेरी मौजूदगी से, रौनक-अफरोज थी।
वो बज़्म भी , अब सुनसान लगती है।।

जिन लबों पर,तबस्सुम थी कल तक।
उनपे भी ग़मजदा मुस्कान लगती है।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile