विज्ञापन

खुले आसमां नीचे , बसर कर लेंगे जिंदगी

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये अंजुमन सजी है,या फिर मयखाना कोई।
        
                                                    
                            
क्यूं मयकश को समझते हो , दीवाना कोई।।

जहां तक भी जाती है हर सिम्त नजर मेरी।
ये ख़ामोश सन्नाटे हैं, या फिर वीराना कोई।।

खुले आसमां नीचे , बसर कर लेंगे जिंदगी।
मेरी जुस्तजू में, घर है ना ही ठिकाना कोई।।
-यूनुस खान
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7417 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13199 कविताएं

View Profile