ये अंजुमन सजी है,या फिर मयखाना कोई।
क्यूं मयकश को समझते हो , दीवाना कोई।।
जहां तक भी जाती है हर सिम्त नजर मेरी।
ये ख़ामोश सन्नाटे हैं, या फिर वीराना कोई।।
खुले आसमां नीचे , बसर कर लेंगे जिंदगी।
मेरी जुस्तजू में, घर है ना ही ठिकाना कोई।।
-यूनुस खान
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