नित रोज होती भोर,
मंज़र भयावह ला रही है ।
कल वो था, आज ये ग्रसित
कल हम सब, की चिंता खा रही है ।।
इंसान को इंसानियत की,
अब चिंता सता रही है।
नित रोज होती भोर,
मंज़र भयावह ला रही है ।।
दुश्मन कहां बैठा छुपा,
अदृश्य हो बृम्हांड में ।
कपटी कहां आ जाये कब,
छलने किसे उन्माद में।
न वेश-भूषा है पता,
न रंग ना पहचान है ।
बस अभी है इतना पता,
वो छुप गया इंसान में।।
है कैसी अजब विडंबना,
किसने है ये व्यूह बुना ।
इंसान ही इंसान का,
इस व्यूह में साधक बना ।
इंसान ही उस काल का,
इंसान में वाहक बना ।।
दूरियों में पास रहना,
पास रह के दूर जाना ।
स्वच्छता नित काज में,
तन-मन को सुदृढ़ बनाना ।
इस गूढ़ भाव को समझना,
और जीत का मंतर बनाना ।
दूरियां मिट जायेंगी सब,
दुश्मन कहीं खो जायेगा ।
जो काल बन के है खड़ा,
वो काल का हो जायेगा। ।
(योगेन्द्र पाल सिंह यादव ) ,
Deputy Architect, Central Public Works Department, Govt. of India
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