आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोरोना का काल

                
                                                         
                            नित रोज होती भोर,
                                                                 
                            
मंज़र भयावह ला रही है ।
कल वो था, आज ये ग्रसित
कल हम सब, की चिंता खा रही है ।।

इंसान को इंसानियत की,
अब चिंता सता रही है।
नित रोज होती भोर,
मंज़र भयावह ला रही है ।।


दुश्मन कहां बैठा छुपा,
अदृश्य हो बृम्हांड में ।
कपटी कहां आ जाये कब,
छलने किसे उन्माद में।

न वेश-भूषा है पता,
न रंग ना पहचान है ।
बस अभी है इतना पता,
वो छुप गया इंसान में।।


है कैसी अजब विडंबना,
किसने है ये व्यूह बुना ।
इंसान ही इंसान का,
इस व्यूह में साधक बना ।
इंसान ही उस काल का,
इंसान में वाहक बना ।।


दूरियों में पास रहना,
पास रह के दूर जाना ।
स्वच्छता नित काज में,
तन-मन को सुदृढ़ बनाना ।
इस गूढ़ भाव को समझना,
और जीत का मंतर बनाना ।

दूरियां मिट जायेंगी सब,
दुश्मन कहीं खो जायेगा ।

जो काल बन के है खड़ा,
वो काल का हो जायेगा। ।

(योगेन्द्र पाल सिंह यादव ) ,
Deputy Architect, Central Public Works Department, Govt. of India



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर