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लौटोगे जब वन से प्रियवर, यह विश्वास सहारा है

Yash Chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वन-पथ पर संग चला प्राण, महल में देह अकेली थी,
        
                                                    
                            
नयनों में सावन ठहरा, साँसों में पीर नवेली थी।

दीप जला पर ज्योति बुझी-सी, सूना हर उत्सव-द्वार रहा,
चन्द्र हँसा अम्बर के ऊपर, मन मेरा तम का हार रहा।

पल-पल पथ की धूल निहारी, आशा का आँचल थामे मैं,
विरह-वृक्ष की शुष्क डाल पर स्मृतियों के पुष्प सजाए मैं।

लौटोगे जब वन से प्रियवर, यह विश्वास सहारा है,
उर्मिला के मौन हृदय में बस प्रेम तुम्हारा प्यारा है।
एक घंटा पहले
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