वन-पथ पर संग चला प्राण, महल में देह अकेली थी,
नयनों में सावन ठहरा, साँसों में पीर नवेली थी।
दीप जला पर ज्योति बुझी-सी, सूना हर उत्सव-द्वार रहा,
चन्द्र हँसा अम्बर के ऊपर, मन मेरा तम का हार रहा।
पल-पल पथ की धूल निहारी, आशा का आँचल थामे मैं,
विरह-वृक्ष की शुष्क डाल पर स्मृतियों के पुष्प सजाए मैं।
लौटोगे जब वन से प्रियवर, यह विश्वास सहारा है,
उर्मिला के मौन हृदय में बस प्रेम तुम्हारा प्यारा है।
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