हर पल.... उन्हें बस याद करते हैं ।
हम वक़्त..... कहाँ बर्बाद करते हैं ।।
बस...... उनके तसव्वुर से अपना ।
आशियाना........ आबाद करते हैं ।।
चुपचाप..... सह लेते हैं सारे सितम ।
ख़िलाफ़ उनके कहां जेहाद करते हैं ।।
ख़ुद रहते हैं....... इश्क़ के पिंजरे में ।
बस परिंदों को हम आज़ाद करते हैं ।।
"काज़ी"......... चाहत की जादूगरी से ।
रंज के लम्हों को भी..... शाद करते हैं ।।
--डॉक्टर वासिफ़ काज़ी