आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क़ का पिंजरा..

                
                                                         
                            हर पल.... उन्हें बस याद करते हैं ।
                                                                 
                            
हम वक़्त..... कहाँ बर्बाद करते हैं ।।

बस...... उनके तसव्वुर से अपना ।
आशियाना........ आबाद करते हैं ।।

चुपचाप..... सह लेते हैं सारे सितम ।
ख़िलाफ़ उनके कहां जेहाद करते हैं ।।

ख़ुद रहते हैं....... इश्क़ के पिंजरे में ।
बस परिंदों को हम आज़ाद करते हैं ।।

"काज़ी"......... चाहत की जादूगरी से ।
रंज के लम्हों को भी..... शाद करते हैं ।।


--डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर