मुझसे हिज्र की अब बात नहीं होती
ज़िंदगी में अमावस की रात नहीं होती ।
बेशक़ीमती हैं उनकी याद के मोती
आँखों से अश्कों की बरसात नहीं होती ।
भीड़ में भी मुझको पहचान गए वो
इससे बेहतर कोई सौग़ात नहीं होती ।
चाँद भी निकलता है तारों को साथ लेकर
तन्हा कभी कोई बारात नहीं होती ।
मुहब्बत नहीं रहम कर रहे हैं मुझ पर
"काज़ी" इससे बढ़कर कोई ख़ैरात नहीं होती ।
~ डॉक्टर वासिफ़ काज़ी
इंदौर ,जिला - इंदौर
मध्यप्रदेश