कायनात खुदा की है इसमें रहता है वसी
हम देखना चाहते आजतक न दिखा हमें
दिल मायूस होता कभी कभी किसे बताएं हम
मायूसी के तीसरे पहर में उगता हुआ ख़्याल देखा
ख्याल में आया वह मगर आंखों में नहीं आता है
दिल की बातें बताता हूं किसी से यकीं नहीं करता है
यकीं है क्या _पत्थर दिल को यकीन कभी होता नहीं है
पत्थर पूजने वाले में एक यकीं का खुदा होता नहीं है
एक खुदा की रट लगाने वाले को भी ख़ुदा नहीं दिखता है
ख़ुदा की आमद रहम दिल में होता_ बे रहम दिल में नहीं
दिल नहीं है तो ख़ुदा नहीं दिखता_ख़ुदा आसमां में नहीं है
-वसी अहमद क़ादरी