आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल नहीं है तो ख़ुदा नहीं दिखता_ख़ुदा आसमां में नहीं है

                
                                                         
                            कायनात खुदा की है इसमें रहता है वसी
                                                                 
                            
हम देखना चाहते आजतक न दिखा हमें
दिल मायूस होता कभी कभी किसे बताएं हम
मायूसी के तीसरे पहर में उगता हुआ ख़्याल देखा
ख्याल में आया वह मगर आंखों में नहीं आता है
दिल की बातें बताता हूं किसी से यकीं नहीं करता है
यकीं है क्या _पत्थर दिल को यकीन कभी होता नहीं है
पत्थर पूजने वाले में एक यकीं का खुदा होता नहीं है
एक खुदा की रट लगाने वाले को भी ख़ुदा नहीं दिखता है
ख़ुदा की आमद रहम दिल में होता_ बे रहम दिल में नहीं
दिल नहीं है तो ख़ुदा नहीं दिखता_ख़ुदा आसमां में नहीं है
-वसी अहमद क़ादरी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर