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तुम्हें देखा है

VIVEK YADAV

Mere Alfaz
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                            इन पहाड़ों में मेरी दोस्त तुम्हें देखा है ,
        
                                                    
                            
सर्द सहमी हुई रातों में तुम्हें देखा है

मैंने देखा है पूरब से तुम्हें उगते हुए
कभी पश्चिम के पहाड़ों में तुम्हें देखा है

तुझसे बिछड़ा तो बढ़ी देखने की चाह तुम्हें,
इसलिए मैंने सुबहो शाम तुम्हें देखा है

देखा है चाँद के आकार में चहरा तेरा
जब कि अरसा हुआ कि मैंने तुम्हें देखा है

लोग कहते हैं कि इतने भी अकेले क्यों हो
जबकि मैंने तो सदा साथ तुम्हें देखा है

दिन गुज़रते हैं तेरे साथ तेरी यादों में
सबने चहरे पे मेरे यार तुम्हें देखा है

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