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मैं टूटे किनारों सा बहता हूं अब

VIVEK YADAV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कलम खो गई है
        
                                                    
                            
वो जब से गई है
मैं टूटे किनारों सा
बहता हूं अब

गगन सो गया है
जमीं खो गई है
मै बिन उसके
बहका सा रहता हूं अब

कि अब सारी नज़्में
अधूरी पड़ीं हैं
मेरी पंक्तियां सब
चिता पर चढ़ीं हैं
कवी मर चुका है
ये कहता हूं अब

कि अब और कविता
न लिख पाऊंगा मै
सिवा दफ्तरों के
न दिख पाऊंगा मै
काम के बोझ से मौत
सहता हूं अब

मैं टूटे किनारों सा
बहता हूं अब..........



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