कलम खो गई है
वो जब से गई है
मैं टूटे किनारों सा
बहता हूं अब
गगन सो गया है
जमीं खो गई है
मै बिन उसके
बहका सा रहता हूं अब
कि अब सारी नज़्में
अधूरी पड़ीं हैं
मेरी पंक्तियां सब
चिता पर चढ़ीं हैं
कवी मर चुका है
ये कहता हूं अब
कि अब और कविता
न लिख पाऊंगा मै
सिवा दफ्तरों के
न दिख पाऊंगा मै
काम के बोझ से मौत
सहता हूं अब
मैं टूटे किनारों सा
बहता हूं अब..........
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