रिश्तों की परिभाषा बदली,
क्योंकि उनकी भाषा बदली!
इतना तुम क्यों बदल गए,
तुम हमसे ही अकड़ गए!!
पैर जमी से तभी उठाना,
जब तुम पूरे पर फैलाना!
पर तब भी मैं इक बात कहूंगा,
तुम अपने हो साथ रहूंगा!!
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।