ऐ हमसफर गर तू मुझे खोना नहीं चाहती
क्या डर है कि तू फिर मेरी होना नहीं चाहती
ख्वाब ऐसे और भी टूटे हैं मेरे सब
ये आंख अब मेरी कहीं सोना नहीं चाहती
इन आंसुओं का घूंट पीकर जल रहा है हर पहर
अब थक चुकी है जिंदगी रोना नहीं चाहती
क्या हद है तेरी ऐश-ओ-आराम-ए-जिंदगी
रहने को टूटे दिल का तू कोना नहीं चाहती
झूठी हंसी मेरी भले मंजूर है तुझको
क्यों गम में भी तू संग मेरे होना नहीं चाहती
है वही तकलीफ दुनिया से भी मेरी जां
चाहती तो मुझको है ,मेरी होना नहीं चाहती
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