विज्ञापन

मौसम की अंगड़ाई

Virendra Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            करवट बदली है
        
                                                    
                            
मौसम ने,और ली है
एक अंगड़ाई।
उमस भरी गर्मी
से राहत,है जन जन
तक पहुंचाई।

गर्मी से बारिश
का मौसम,बदल
रहा है अब पल पल।
प्यास बुझाने,शुष्क
धरा की, बादल
लेकर आते हैं जल।

इस बारिश के
मौसम मेंअब, होगा
लुका छुपी का खेल।
सूरज और बादल
मिलजुल कर,खेलेंगे
बर्षा का खेल।

लाते बादल भर भर
पानी,और बर्षा
कर वापस जाते।
देकर धरती को
बर्षा जल,तृप्ति धरा
को हैं पहुंचाते।

घिर घिर के घनघोर
घटाएं, लाते बादल
अपने साथ।
छुपता सूरज,
दूर कहीं जा,लगा
हो गई दिन में रात।

लुका छुपी के
इसी खेल में,निकला
सूरज चमकी धूप।
पीछे से फिर झुंड में
बादल,आ पहुंचे
धरे, अनेकों रुप।

"गुरु जी" हरियाली है
जल से पोषित,जल
से होती जीव सुरक्षा।
कर संरक्षण इस
जल का सब,करें
सुनिश्चित जीवन रक्षा।

वीरेन्द्र कुमार
नई दिल्ली
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kahar

5 कविताएं

View Profile