विज्ञापन

सबको पता है

Vinod H.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल की अगन को
        
                                                    
                            
पहचानते हैं
सबको पता है
ये सब जानते हैं

जन्म देना है पूतों को
जीहां जी मुश्किल
फ़िर बनाना सपूत
जी और भी मुश्किल
ये जो बाहर गुनाह
कपूत करे हैं
सबको पता है
ये घर से चले हैं
पैरों में बेड़ी जो
घर पे पड़े है
बहन किसी की
जी फिर क्यों डरे हैं

दिल की अगन को
पहचानते है
सबको पता है
ये सब जानते हैं

पाप जन्मा नहीं है
यहाँ दो दिनों में
रहता मौजूद है ये
यहाँ हर किसीमें
ख़त्म करना है इसको
बस इतना करो तुम
साथ निर्बल के होकर
बस इससे लड़ो तुम
संग मिलके हमतुम
यहां जो खड़े हैं
ये तीर न तलवार
लाठी से ही डरे हैं


दिल की अगन को
पहचानते हैं
सबको पता है
सब जानते हैं

-विनोद यादव 'शहीद'


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Amit Kumar

85 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8604 कविताएं

View Profile

Aparajit Nandi

17 कविताएं

View Profile