ज़िन्दगी मिले तो
कभी विष का प्याला
कभी घूँट अमृत बन जाती हो
ज़िन्दगी मिले तो पूछूँ
क्यों नित नए रंग दिखाती हो ।
पिया हलाहल शिव ने
फिर भी बुँदे कुछ गिराती हो
फिर रावण से दानव का
जन्म धरा कराती हो
ज़िन्दगी मिले तो पूछूँ
क्यों नित नए रंग दिखाती हो
घड़ा जो निकले मंथन से
देव अमृत पान कराती हो
भार धरा के मानव का
तुम विष्णु को धराती हो
ज़िन्दगी मिले तो पूछूँ
क्यों नित नए रंग दिखाती हो
अवतारी विष्णु से
असुर संहार कराती हो
कार्य अग्निपरीक्षा का
सीता से कराती हो
ज़िन्दगी मिले तो पूछूँ
क्यों नित नए रंग दिखाती हो
विनोद यादव 'शहीद'
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