मैं कोई कविता नहीं, जस्बात लिखता हूँ।
मेरा कोई अंत नहीं, मैं आगाज़ लिखता हूँ।
मुझमें प्यास है बड़ी, मैं समुंदर लिखता हूँ।
मुझमें आस है बड़ी, मैं मिट्टी लिखता हूँ।
मुझमें बोहोत ऊँची उड़ान है, मैं आसमान लिखता हूँ।
मैंने जुर्रत की है चलने की, मैं इस धरती को पैरों तले नापता हूँ।
मुझे शिकायत नहीं ख़ुदा से कोई, मैं भविष्य भांपता हूँ।
मैं कोई कविता नहीं, जस्बात लिखता हूँ।
घने अँधेरों में रह कर, मैं जुगनू ताकता हूँ।
मैं मासूम हूँ बड़ा, लेकिन सुरज सा दहकता हूँ।
भोले में भक्ति मेरी, मैं तीसरी आँख से देखता हूँ।
क्या मजाल कोई मुझे मूरख करार दे दे, मैं तो सरस्वती जी की पुजा करता हूँ।