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बदलते चेहरे और अजीब दौर

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक्त के साथ अपनों के बदलते चेहरे देखे हैं,
        
                                                    
                            
सच कहूँ यारों, मैंने भी ज़िंदगी के कई अजीब दौर देखे हैं।
रिश्तों की इस भीड़-भाड़ भरी बाज़ार में,
हमने अपनों के चेहरों पर नकाबों के पहरे देखे हैं।
जिन पर कभी आँख मूँद कर भरोसा किया हमने,
वक्त की धूप में उनके इरादे बदलते देखे हैं।
दर्द की इस अनन्त और गहरी खामोशी में,
हमने अपनों के ही दिए ज़ख्म बहुत गहरे देखे हैं।
वादों के महल जो बनाए थे कभी चाहत में,
हमने उन्हें हकीक़त की आंधी में ढहते देखे हैं।
कोई अपना बनकर साथ चलने का दावा करता था,
हमने मुसीबत में उन्हें रास्तों पर मुँह फेरे देखे हैं।
जिंदगी की इस कठिन और लंबी राह पर,
हमने हर मोड़ पर वक्त के नए-नवेले पहरे देखे हैं।
ऐ 'विक्की' इस बेदर्द दुनिया का दस्तूर यही है,
हमने यहाँ हर शख्स के चेहरे पर कई चेहरे देखे हैं।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
5 घंटे पहले
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